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आध्यात्मिक इंजीनियर थे स्वामी विवेकानंद

Posted On: 12 Jan, 2014 Others में

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भारतीय आध्यात्मिक विभूतियों में स्वामी विवेकानंद का स्थान स्वर्णाक्षरों में अंकित है।यहाँ की सांस्कृतिक विरासत को सूदूर पूर्व पश्चिमी धरातल पर प्रतिष्ठापित करने का श्रेय स्वामी जी को जाता है।इस वर्ष 12 जनवरी को समूचा विश्व स्वामी जी की 151 वीं जयंती मना रहा है,यदि समग्र अर्थो में देखें, तो लगता है स्वामी विवेकानंद आज के युग की सबसे बड़ी आवश्यकता थे।अध्यात्म के नाम पर जिस तरह से कुछ तथाकथित धर्माचार्यों के मंतव्य जग जाहिर हो रहे हैं,ऐसे में स्वामी जी की शिक्षाओं को आत्मसात करने की और भी ज़्यादा ज़रूरत अनुभव होने लगी है।

कोलकाता निवासी हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता श्री विश्वनाथ दत्त और श्रीमती भुवनेश्वरी देवी के घर 12 जनवरी 1863 को एक चिराग़ रोशन हुआ;जिसका नाम रखा गया -नरेन्द्र दत्त।मातृसत्ता के उपासक गुरु रामकृष्ण परमहंस ने उन्हें सन्यास में दीक्षित किया और नाम दिया  ‘-स्वामी विवेकानंद’। उनके पिता पाश्चात्य संस्कृति के अनुगामी थे और नरेन्द को अंग्रेजी पढ़ाकर ऊँचे ओहदे का सरकारी मुलाज़िम बनाना चाहते थे परन्तु उनकी माता जी गहरी  आध्यात्मिक आस्था रखने वाली विद्वान महिला थी।उनके घर साधु -संतों और योगियों का आना जाना बना रहता था।असाधारण रूप से बुद्धिमान नरेन्द्र ,धार्मिक और आध्यात्मिक रहस्यों की बाबत सवाल करते ,तो बड़े -बड़े संत उन्हें मुंह बाये देखते रह जाते।सबसे पहले नरेन्द्र दत्त का  संपर्क ‘ब्रह्म समाज’ से हुआ लेकिन उनका वास्तविक गंतव्य बना गुरु रामकृष्ण परमहंस का सानिध्य।यही से वे अपनी वास्तविक चमक को उपलब्ध हुए ,जिससे आज तक देशना का जगत सुवासित हो रहा है,सुगंधित हो रहा है।

विवेकानंद मूल्यों के स्वप्नदृष्टा थे। वे एक ऐसे समाज की कल्‍पना करते थे,जिसमें धर्म या जाति के आधार पर मनुष्‍य-मनुष्‍य में कोई भेद नहीं रहे। उन्‍होंने वेदांत के सिद्धांतों को इसी रूप में रखा। अध्‍यात्‍मवाद बनाम भौतिकवाद के विवाद में पड़े बिना भी यह कहा जा सकता है कि समता के सिद्धांत का जो आधार विवेकानन्‍द ने दिया, उससे सबल बौदि्धक आधार शायद ही ढूंढा जा सके। विवेकानन्‍द को युवकों से बड़ी आशाएं थीं। यदि मैं यह कहूं की विवेकानंद सामाजिक -आध्यात्मिक व्यवस्था के पहले इंजिनियर थे ,तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी।उन्हें आभास था की भविष्य में भारत में युवाओं का वर्चस्व होगा ,इसी को देखते हुए उन्होंने चरित्र निर्माण और शुचिता को अपनाने का आहवान किया।

उनका कहना था -”मन का विकास करो और उसका संयम करो, उसके बाद जहाँ इच्छा हो, वहाँ इसका प्रयोग करो–उससे अति शीघ्र फल प्राप्ति होगी। यह है यथार्थ आत्मोन्नति का उपाय। एकाग्रता सीखो, और जिस ओर इच्छा हो, उसका प्रयोग करो। ऐसा करने पर तुम्हें कुछ खोना नहीं पड़ेगा। जो समस्त को प्राप्त करता है, वह अंश को भी प्राप्त कर सकता है।”

सन्‌ 1893 में शिकागो (अमेरिका) में विश्व धर्म परिषद् हो रही थी। तीस वर्षीय  स्वामी विवेकानन्द उसमें भारत के प्रतिनिधि के रूप में पहुँचे। योरोप-अमेरिका के लोग उस समय पराधीन भारतवासियों को बहुत हीन दृष्टि से देखते थे। वहाँ लोगों ने बहुत प्रयत्न किया कि स्वामी विवेकानन्द को सर्वधर्म परिषद् में

बोलने का समय ही न मिले। एक अमेरिकन प्रोफेसर के प्रयास से उन्हें थोड़ा समय मिला किन्तु उनके विचार सुनकर सभी विद्वान चकित हो गये। फिर तो अमेरिका में उनका अत्यधिक स्वागत हुआ। वहाँ इनके भक्तों का एक बड़ा समुदाय हो गया। तीन वर्ष तक वे अमेरिका में रहे और वहाँ के लोगों को भारतीय तत्वज्ञान की अद्भुत ज्योति प्रदान करते रहे। उनकी वक्तृत्व-शैली तथा ज्ञान को देखते हुए वहाँ के मीडिया ने उन्हें ’साइक्लॉनिक हिन्दू’ का नाम दिया। ”आध्यात्म-विद्या और भारतीय दर्शन के बिना विश्व अनाथ हो जाएगा” यह स्वामी विवेकानन्द का दृढ़ विश्वास था। अमेरिका में उन्होंने रामकृष्ण मिशन की अनेक शाखाएँ स्थापित कीं।

उनके इस भाषण की सर्वत्र चर्चा होती है ;उसका एक संक्षिप्त अंश मैं आपसे साँझा कर रहा हूँ-

”अमेरिकी बहनों और भाइयों,

आपने जिस सौहार्द और स्नेह के साथ हम लोगों का स्वागत किया हैं, उसके प्रति आभार प्रकट करने के निमित्त खड़े होते समय मेरा हृदय अवर्णनीय हर्ष से पूर्ण हो रहा हैं। संसार में संन्यासियों की सब से प्राचीन परम्परा की ओर से मैं आपको धन्यवाद देता हूँ; धर्मों की माता की ओर से धन्यवाद देता हूँ; और सभी सम्प्रदायों एवं मतों के कोटि-कोटि हिन्दुओं की ओर से भी धन्यवाद देता हूँ।मैं इस मंच पर से बोलनेवाले उन कतिपय वक्ताओं के प्रति भी धन्यवाद ज्ञापित करता हूँ, जिन्होंने  आपको यह बतलाया हैं कि सुदूर देशों के ये लोग सहिष्णुता का भाव विविध देशों में प्रचारित करने के गौरव का दावा कर सकते हैं। मैं एक ऐसे धर्म का अनुयायी होने में गर्व का अनुभव करता हूँ, जिसने संसार को सहिष्णुता तथा सार्वभौम स्वीकृति, दोनों की ही शिक्षा दी हैं। हम लोग सब धर्मों के प्रति केवल सहिष्णुता में ही विश्वास नहीं करते, वरन् समस्त धर्मों को सच्चा मान कर स्वीकार करते हैं। मुझे ऐसे देश का व्यक्ति होने का अभिमान हैं, जिसने इस पृथ्वी के समस्त धर्मों और देशों के उत्पीड़ितों और शरणार्थियों को आश्रय दिया हैं। मुझे आपको यह बतलाते हुए गर्व होता हैं कि हमने अपने वक्ष में यहूदियों के विशुद्धतम अवशिष्ट को स्थान दिया था, जिन्होंने दक्षिण भारत आकर उसी वर्ष शरण ली थी, जिस वर्ष उनका पवित्र मन्दिर रोमन जाति के अत्याचार से धूल में मिला दिया गया था । ऐसे धर्म का अनुयायी होने में मैं गर्व का अनुभव करता हूँ, जिसने महान् जरथुष्ट्र जाति के अवशिष्ट अंश को शरण दी और जिसका पालन वह अब तक कर रहा हैं।”

गुरुदेव रविन्द्र नाथ टैगोर  ने एक बार कहा था, ‘‘यदि आप भारत को जानना चाहते हैं तो विवेकानंद को पढ़िए। उनमें आप सब कुछ सकारात्मक ही पाएँगे, नकारात्मक कुछ भी नहीं।’’

रोमां रोलां के शब्दों में  ‘‘उनके द्वितीय होने की कल्पना करना भी असंभव है। वे जहाँ भी गए, सर्वप्रथम रहे , हर कोई उनमें अपने नेता का दिग्दर्शन करता। वे ईश्वर के प्रतिनिधि थे और सब पर प्रभुत्व प्राप्त कर लेना ही उनकी विशिष्टता थी।हिमालय प्रदेश में एक बार एक अनजान यात्री उन्हें देख ठिठककर रुक गया और आश्चर्यपूर्वक चिल्ला उठा, -‘शिव !’  यह ऐसा हुआ मानो उस व्यक्ति के आराध्य देव ने अपना नाम  विवेकानंद के माथे पर लिख दिया हो।’’

भारत प्राचीन काल से संपूर्ण विश्व के लिए आध्यात्मिक अभिभावक की भूमिका का निर्वहन करता रहा है।ज्ञान की विशिष्ट खोजें और परिपाटियाँ सर्वप्रथम भारत में ही प्रतिपादित हुई।आज पूरी दुनिया में शिक्षा के उच्चतम आयामों के लिए विश्व विद्यालय अस्तित्व में हैं,इनकी सर्वप्रथम शुरुआत भारत में ही हुई थी।बिहार में ‘नालंदा विश्वविद्यालय ’दुनिया का सबसे प्राचीनतम विश्व विद्यालय होने का गौरव रखता है।नौवीं शताब्दी में मुस्लिम आक्रंताओं ने इस शिक्षालय की लाईब्रेरी को आग के हवाले कर दिया,जिससे इसमें रखे लगभग  9 हज़ार ज्ञान के विशिष्ट ग्रन्थ जलकर खाक हो गये।कुछ ग्रंथों को बौद्ध भिक्षु अपने वस्त्रों में छिपाकर तिब्बत और चीन भाग गए ,इन ग्रंथों को आधार मानकर इन देशों में अनेक कलाएं और पद्दतियां विकसित हुई जिन्हें आज हम विभिन्न नामों से जानते हैं।मार्शल आर्ट्स की अनेक विधाएं और फेंगसुई ,रेकी आदि इसके प्रमाण हैं। मैं यहाँ इन बातों का ज़िक्र इस लिए कर रहा हूँ,कि स्वामी विवेकानंद पहले मनीषी थे ,जिन्होंने इन सत्यों को आत्मसात करते हुए एक ओर जहाँ प्रेम ओर सहिष्णुता का सन्देश दुनिया को दिया ,वहीँ दूसरी ओर सबको इस तथ्य से भी आत्मसात कराया कि भारत का मूल सन्देश शांति और अहिंसा है।जो मनुष्य मात्र तक ही सीमित नहीं है अपितु सभी प्राणियों के प्रति सदभाव का हेतु है।यही वेदों का भी सार है।

यथा-

रुचिनां वैचित्र्यादृजुकुटिलनानापथजुषाम् ।

नृणामेको गम्यस्त्वमसि पयसामर्णव इव ।।

- ‘ जैसे विभिन्न नदियाँ भिन्न भिन्न स्रोतों से निकलकर समुद्र में मिल जाती हैं, उसी प्रकार हे प्रभो! भिन्न भिन्न रुचि के अनुसार विभिन्न टेढ़े-मेढ़े अथवा सीधे रास्ते से जानेवाले लोग अन्त में तुझमें ही आकर मिल जाते हैं।’

स्वामी जी आज़ादी की लडाई के भी एक प्रमुख प्रेरणा-स्रोत बने। उनका विश्वास था कि पवित्र भारतवर्ष धर्म एवं दर्शन की पुण्यभूमि है। यहीं बड़े-बड़े महात्माओं व ऋषियों का जन्म हुआ, यही संन्यास एवं त्याग की भूमि है तथा यहीं आदिकाल से लेकर आज तक मनुष्य के लिए जीवन के सर्वोच्च आदर्श एवं मुक्ति के मार्ग प्रशस्त हुए हैं। उनका प्रसिद्द कथन है-‘‘उठो, जागो, स्वयं जागकर औरों को जगाओ। अपने मानव जन्म को सफल करो और तब तक रुको नहीं, जब तक कि लक्ष्य प्राप्त न हो जाए।’

स्वामी विवेकानंद सिर्फ संत ही नहीं थे वे एक महान् देशभक्त, वक्ता, विचारक, लेखक और मानव-प्रेमी भी थे। अमेरिका से लौटकर उन्होंने देशवासियों का आह्वान करते हुए कहा था, ‘‘नया भारत निकल पड़े मोदी की दुकान से, भड़भूंजे के भाड़ से, कारखाने से, हाट से, बाजार से; निकल पडे झाड़ियों, जंगलों, पहाड़ों, पर्वतों से।’’ और जनता ने स्वामीजी की पुकार का उत्तर दिया। वह गर्व के साथ निकल पड़ी। गांधीजी को आजादी की लड़ाई में जो जन-समर्थन मिला, उसमें विवेकानंद के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता।

स्वामी विवेकानंद के ओजस्वी और सारगर्भित व्याख्यानों की प्रसिद्धि विश्चभर में है। जीवन के अंतिम समय में उन्होंने शुक्ल यजुर्वेद की व्याख्या की और कहा “एक और विवेकानंद चाहिए, यह समझने के लिए कि इस विवेकानंद ने अब तक क्या किया है।”

जीवन विज्ञानी इस तथ्य की पुष्टि करते हैं कि जब मन बुद्धि और आत्मा का विकास होता है तो प्रायः शरीर निर्बल हो जाता है ;यही विवेकानंद के साथ हुआ। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार जीवन के अंतिम दिन भी उन्होंने अपने ’ध्यान’ करने की दिनचर्या को नहीं बदला और प्रात: दो तीन घंटे ध्यान किया। उन्हें दमा और शुगर के अतिरिक्त अन्य शारीरिक व्याधियों ने घेर रक्खा था। उन्होंने कहा भी था, ‘यह बीमारियाँ मुझे चालीस वर्ष की आयु भी पार नहीं करने देंगी।’ 4 जुलाई, 1902 को बेलूर में रामकृष्ण मठ में उन्होंने ध्यानमग्न अवस्था में महासमाधि धारण कर प्राण त्याग दिए। उनके शिष्यों और अनुयायियों ने उनकी स्मृति में वहाँ एक मंदिर बनवाया और समूचे विश्व में विवेकानंद तथा उनके गुरु रामकृष्ण के संदेशों के प्रचार के लिए 130 से अधिक केंद्रों की स्थापना की, जो सफलता पूर्वक उस युगदृष्टा के अधूरे  पड़े कार्यों को पूरा करने का दायित्व संभल रहे हैं।

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