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सूर्य के राशि परिवर्तन का उत्सव

Posted On: 15 Jan, 2015 Others में

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सूर्य को सौर मंडल का अधिपति कहा गया है। सूर्य सभी ग्रहों के राजा हैं। मानवीय सभ्यता के विकासक्रम में जैसे-जैसे व्यक्ति की चेतना का विकास हुआ; वैसे-वैसे उसने पशुवत् जीवन से पृथक मनुष्यता के गुणों को आत्मसात करना प्रारम्भ किया। क्रमशः विभिन्न मतों,पंथों और धर्मों का प्रादुर्भाव हुआ। परमात्मा के साक्षात प्रतिनिधि के रूप में चूँकि सूर्य उपस्थित था अतः एव सूर्य को ही भगवान मानकर उसकी आराधना शुरू हुई। प्रायः सभी धर्मों और सम्प्रदायों मंत सूर्य की महत्वता इंगित है। अपने-अपने तौर तरीकों से पूरी दुनिया के लोग सूर्य की उपासना करते हैं। संक्रांति सूर्य की राशि परिवर्तन का दिवस है ,इसे एक अनिवार्य उत्सव के रूप में मनाये जाने की परंपरा अत्यंत प्राचीन समय से है। हिंद्कुश पर्वत श्रृंखला में निवासित विश्व की सर्वप्रथम सभ्य संगत ‘हिन्दुओं’ ने सूर्य को सबसे पहले एक ‘देव’ की संज्ञा दी और उसकी उपासना सुनिश्चित की।
वेद’ भारतीय संस्कृति और सभ्यता के महासागर के खिले ऐसे स्वर्णिम पुष्प हैं जिनकी आभा में सदियों का फेरा नये-नये रंग बदलता चला गया है। ‘वेद’ समूचे संसार पर भारत का उपकार है। चारों वेद -’ऋग,साम.अथर्व और यजुर्वेद परमात्मा की वाणी है। किसी भी वेद में यह नहीं लिखा गया है कि वे सिर्फ हिन्दुओं के लिए हैं। वहां प्राणिमात्र का उल्लेख किया गया है। वेद की समग्र देशना एक ऐसे संतुलन में विश्वास रखती है; जहाँ प्रकृति से लेकर नियति और मनुष्य से लेकर समस्त जीवजंतुओं ;यहाँ तक की पेड़ -पौधों तक के प्राणों को सम्मान और सुरक्षा की दृष्टि से देखा गया है।आज जब धर्म और उनकी आस्थाएं विभिन्न प्रश्नों के दायरे में आन खड़ी हुई हैं, ऐसे में वेदों की विशिष्टता उन्हें और भी अधिक गौरव और गरिमा का पात्र निर्धारित करती है।वेद का मानने वाला समस्त के प्रति अहोभाव से आपूरित है।

आप सोच रहे होंगे कि संक्रांति के अवसर पर यह क्या वेदों का गुणगान करने बैठ गया। वस्तुतः सूर्य और वेद एक दूसरे के पूरक हैं। चतुर्थ वेदों में सर्वाधिक स्तुतियाँ सूर्य की है हैं। वेदों का सिरमौर गुरु गायत्री मंत्र सबसे ज़्यादा उच्चारित किये जाने वाली वैदिक प्रार्थना है। यथा -
‘ओउम्’ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुवर्रेणीयम भर्गो देवस्य धीमहि।
धियो यो नः प्रचोदयात ।।
(यजुर्वेद /अध्याय-36/मंत्र -3)
अर्थात ‘-हे ! जगदोत्पादक वरने योग्य सर्वश्रेष्ठ पापनाशक प्रभो ! हम आपके दिव्य गुणों का ध्यान करते हैं।आप कृपा कर हमारी बुद्धियों को शुभ कार्यों हेतु प्रेरणा प्रदान करें।’
मकर संक्रांति पर गायत्री मंत्र के ही सर्वाधिक पारायण की महत्वता है।
पृथ्वी की गति प्रतिवर्ष पीछे और सूर्य का संक्रमण आगे बढ़ता है। इसके कारण संक्रांति कभी एक दिन आगे तो कभी पीछे आती है। अनेक शुभ संयोगों के साथ तीन वर्ष के बाद मकर संक्रांति इस बार 15 जनवरी को है। इसके पूर्व 2012 में भी मकर संक्रांति 15 जनवरी को ही थी। पञ्चांग के अनुसार 14 जनवरी की शाम 7.27 बजे से सूर्य मकर राशि में प्रवेश करेगा, लेकिन शाम 5.58 बजे ही सूर्यास्त हो जाएगा। संक्रांति चूंकि सूर्य का पर्व है, इसलिए सूर्य के साक्षी नहीं होने से यह 15 जनवरी को मनेगी। स्नान, दान-पुण्य के लिए भी 15 जनवरी को उदय काल में संक्रांति सर्वश्रेष्ठ रहेगी। हालांकि लीप ईयर में पृथ्वी और सूर्य दोनों वापस उसी स्थिति में आ जाते हैं।
‘आर्यम संहिता’ के अनुसार वर्ष 2015 के बाद 2016, 2019, 2020 में भी संक्रांति 15 जनवरी को है, जबकि बीच में 2017, 2018 तथा वर्ष 2021 में संक्रांति 14 तारीख को होगी। इस वर्ष ‘समसप्तक योग’ सृजित हो रहा है। ग्रहों का एक-दूसरे से सातवीं राशि में होना समसप्तक योग कहलाता है। मकर संक्रांति पर मकर राशि में सूर्य के साथ बुध व शुक्र है। इन तीनों ग्रहों से सातवीं राशि में गुरु है। इस प्रकार समसप्तक योग बन रहा है। इस वर्ष के राजा शनि तथा मंत्री मंगल हैं। मकर राशि में सूर्य, शुक्र और बुध का संयोग देश-दुनिया के लिए लाभकारी रहेगा।
प्रति वर्ष पौष मास में जब सूर्य मकर राशि पर आता है तभी इस पर्व को मनाया जाता है। मकर संक्रान्ति के दिन से ही सूर्य की उत्तरायण गति भी प्रारम्भ होती है। इसलिये इस पर्व को कहीं-कहीं ‘उत्तरायणी’ भी कहते हैं।तमिलनाडु में इसे ‘पोंगल’ उत्सव के रूप में मनाते हैं जबकि कर्नाटक, केरल तथा आंध्र प्रदेश में इसे केवल ‘संक्रांति’ ही कहते हैं।
हिन्दू राष्ट्र नेपाल के सभी प्रान्तों में यह त्यौहार अलग-अलग नाम व विभिन्न रीति-रिवाजों के साथ धूमधाम से मनाया जाता है। मकर संक्रान्ति के दिन किसान अपनी अच्छी फसल के लिए भगवान को धन्यवाद देकर अपनी अनुकम्पा को सदैव लोगों पर बनाये रखने का आशीर्वाद माँगते हैं। इसलिए मकर संक्रान्ति के त्यौहार को फसलों एवं किसानों के त्यौहार के नाम से भी जाना जाता है।
नेपाल मे मकर संक्रान्ति को ‘माघे-संक्रान्ति’, ‘सूर्योत्तरायण’ और थारू समुदाय में ‘माघी’ कहा जाता है। इस दिन नेपाल सरकार सार्वजनिक छुट्टी देती है। थारू समुदाय का यह सबसे प्रमुख त्यैाहार है। नेपाल के बाकी समुदाय भी तीर्थस्थलों पर स्नान करके दान-ध्यान करते हैं। तिल, घी, शर्करा और कन्दमूल इस पर्व के वहां मुख्य भोज्य पदार्थ हैं । श्रृद्धालु नदियों के संगम पर लाखों की संख्या में नहाने के लिये जाते हैं। तीर्थस्थलों में रूरूधाम (देवघाट) व त्रिवेणी मेला सबसे ज्यादा प्रसिद्ध है।सम्पूर्ण भारत में मकर संक्रान्ति विभिन्न रूपों में संपन्न होती है। विभिन्न प्रान्तों में इस त्यौहार को मनाने के जितने अधिक रूप प्रचलित हैं उतने किसी अन्य पर्व के नहीं। हरियाणा और पंजाब में इसे ‘लोहड़ी’ के रूप में एक दिन ही मनाया जाता है। इस दिन अँधेरा होते ही आग जलाकर सूर्य के प्रतीक अग्निदेव की पूजा करते हुए तिल, गुड़, चावल और भुने हुए मक्के की आहुति दी जाती है। लोग मूंगफली, तिल की बनी हुई गज़क और रेवड़ियाँ आपस में बाँटकर खुशियाँ सांझी करते हैं। बहुएँ घर-घर जाकर लोकगीत गाकर लोहड़ी माँगती हैं। नई बहू और नवजात बच्चे के लिये लोहड़ी का विशेष महत्व होता है। इसके साथ पारम्परिक मक्का की रोटी और सरसों के साग के बिना लोहड़ी का आनंद अधूरा है। यू.पी. में मकर संक्रांति मुख्य रूप से ‘दान का पर्व’ है। इलाहाबाद में गंगा,यमुना और सरस्वती के संगम पर प्रत्येक वर्ष एक माह तक ‘माघ मेला’ लगता है जिसका इस पर्व से अटूट रिश्ता है । तिल, चिवड़ा, गौ, स्वर्ण, ऊनी वस्त्र, कम्बल आदि दान करने की भी परम्पराएँ रही हैं।बिहार में मकर संक्रान्ति को ‘खिचड़ी’ नाम से जाना जाता हैं। इस दिन उड़द, चावल की खिचड़ी खाने और बाँटने का अपना ही महत्व है। महाराष्ट्र में इस दिन सभी विवाहित महिलाएँ अपनी पहली संक्रान्ति पर कपास, तेल व नमक आदि चीजें अन्य सुहागिन महिलाओं को दान करती हैं। ‘तिल-गूल’ नामक हलवे के बाँटने की प्रथा भी है। लोग एक दूसरे को तिल-गुड़ देते हैं और देते समय बोलते हैं -”लिळ गूळ ध्या आणि गोड़ गोड़ बोला” अर्थात- ‘तिल गुड़ लो और मीठा-मीठा बोलो’। इस दिन महिलाएँ आपस में तिल, गुड़, रोली और हल्दी बाँटती हैं। मान्यता है इससे सौभाग्य बढ़ता है।
बंगाल में इस पर्व पर स्नान के पश्चात तिल दान करने की प्रथा है। यहाँ गंगासागर में प्रति वर्ष विशाल मेला लगता है। कहा जाता है मकर संक्रान्ति के दिन ही गंगा भगीरथ के पीछे-पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होकर सागर में जा मिली थीं। मान्यता यह भी है कि इस दिन रुक्मणि ने श्री कृष्ण को प्राप्त करने के लिये व्रत किया था। इस दिन गंगासागर में स्नान-दान के लिये लाखों लोगों की भीड़ होती है। लोग कष्ट उठाकर गंगा सागर की यात्रा करते हैं। वर्ष में केवल एक दिन मकर संक्रान्ति को यहाँ लोगों की अपार भीड़ होती है। इसीलिए कहा जाता है-’सारे तीरथ बार-बार, गंगा सागर एक बार।’
तमिलनाडु में इस त्योहार को ‘पोंगल’ के रूप में चार दिन तक मनाते हैं। प्रथम दिन ‘भोगी-पोंगल’, दूसरे दिन ‘सूर्य-पोंगल’, तीसरे दिन ‘मट्टू-पोंगल’ अथवा ‘केनू-पोंगल’ और चौथे व अन्तिम दिन ‘कन्या-पोंगल’। इस प्रकार पहले दिन कूड़ा करकट इकठ्ठा कर जलाया जाता है, दूसरे दिन लक्ष्मी जी की पूजा की जाती है और तीसरे दिन पशु धन की पूजा की जाती है। पोंगल मनाने के लिये स्नान करके खुले आँगन में मिट्टी के बर्तन में खीर बनायी जाती है, जिसे पोंगल कहते हैं। इसके बाद सूर्यदेव को नैवैद्य चढ़ाया जाता है। उसके बाद खीर को प्रसाद के रूप में सभी ग्रहण करते हैं। इस दिन बेटी और जमाई का विशेष रूप से स्वागत किये जाने की परम्परा है।
असम में मकर संक्रान्ति को ‘माघबिहू’ अथवा ‘भोगालीबिहू’ के नाम से मनाते हैं।राजस्थान में इस पर्व पर सुहागन महिलाएँ अपनी सास को वायना देकर आशीर्वाद प्राप्त करती हैं। साथ ही महिलाएँ किसी भी सौभाग्यसूचक वस्तु का चौदह की संख्या में पूजन एवं संकल्प कर चौदह कन्याओं को दान देती हैं।
वैदिक धर्म का तो आधार केंद्र ही सूर्य है। इसीलिए समस्त वैदिक क्रियाओं की निष्पत्ति का सर्वश्रेष्ठ समय सूर्य उपस्थिति में ही माना गया है। ईसाईयों के गिरिजाघरों में मोमबत्ती का प्रज्ज्वलन , सिख समुदाय में ‘प्रकाश पर्व’ ,पारसियों में यज्ञ -हवन सब परोक्ष रूप से सूर्य की ही प्रार्थनाएं हैं। यहीं नहीं इस्लाम में भी सूर्य के महत्व को समझकर ही रमज़ान की समस्त प्रक्रियाएं समपन्न होती हैं। रोज़ेदार सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक कुछ भी भोज्य पदार्थ ग्रहण नहीं करते ! जैन धर्म में सूर्य की सर्वोच्च सत्ता विध्यमान है। जैन समुदाय के लोग सूर्य की उपस्थति में भोजन करना शुभ और श्रेष्ठ मानते हैं। बुद्ध धर्म की अंतस चेतना तो बुद्ध को सूर्य का ही पुत्र मानती है ; ज्ञान का नूतन सूर्योदय। स्वयं बुद्ध ने भी अपने सम्बुद्ध जीवन काल में सूर्यास्त उपरान्त भोजन ग्रहण का निषेध किया। कहने का तात्पर्य यह है कि सूर्य सभी के हैं और उनके सब।
सूर्य किसी की परिक्रमा नहीं करता जबकि अन्य ग्रह उसकी परिक्रमा करते हैं। अत्यंत गहरे अर्थों में सूर्य हमारे सुदूरवर्ती महापिता हैं। सूर्य से टूटकर पृथ्वी बनी। पेड़ -पौधों ,जलचर,थलचर और कीट-पतंगों से होते हुए पशु पक्षियों तक की जीवन यात्रा में मनुष्य सहभोगी रहा।बहुत पहले के विचारकों ने यह भली -भाँति समझ लिया था कि हमारे जीवन का सम्पूर्ण दारोमदार सूर्य के इर्द -गिर्द घूमता है। सभी देशों में इस बात पर सभी सहमत है कि मनुष्य को यदि स्वस्थ रहना है तो सूर्योदय से पूर्व उसे उठ जाना चाहिए। आयुर्वेद का गहरे से गहरा सिद्धांत सूर्य के अनुसार हमारे समस्त तंत्रिका -तंत्र का पता देता है। अब तो वैज्ञानिक भी सहमत हो चुके हैं कि यदि हमसे करोड़ों प्रकाश वर्ष दूर बैठा सूर्य अपनी उपस्थिति गौण कर ले; तो यहाँ पृथ्वी पर रहने वाले अरबों मनुष्यों का जीवन कुछ ही समय तक बच सकेगा। वातावरण में मनुष्यों के लिए जीवनदायी ऑक्सीज़न सूर्य की उपस्थिति का प्रतिफल है। मनुष्य ही नहीं पेड़-पौधे और जीव-जंतु भी नहीं बचेंगे। वनस्पति विज्ञान को जानने वाले जानते हैं कि अधिकांश पेड़-पौधे अपना भोजन सूर्य के प्रकाश से होने वाली संश्लेषण क्रिया द्वारा उत्पन्न क्लोरोफिल से ही बना पाते हैं।



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