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अपनी भव्य धरोहरों से विस्मृत भारत

Posted On: 18 Apr, 2015 Others में

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‘वर्ल्ड हेरिटेज डे’ -18 अप्रैल पर विशेष
विश्व की भव्य और दिव्य सम्पदा के सबसे बड़े सहोदरों में से एक भारत को अपनी धरोहरों के बारे में गफलत है। यह कोई शिकायत नहीं एक सच्चाई है। स्वीकृति और अनुशंसा की जिन सीढ़ियों को चढ़कर कोई भी सम्पदा वैश्विक गौरव का वरण करती है, उसकी भरमार होने के बावजूद भारत इस सूची में बहुत पीछे खड़ा दिखाई देता है। यदि यूँ कहें की हमारी सरकारों के उदासीन और स्वार्थपरक नज़रियों के चलते हमारी यह स्थिति हुई है तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी ! भारत के स्थान नहीं ; भारत तो स्वयं में एक ऐसा देश है जिसे वैश्विक धरोहर का सबसे प्रबल प्रतीक होना चाहिए था ! परन्तु बूढी राजनीति की कमज़ोर बीनाई सिर्फ अपने मतलब के चेहरे ही पहचानती है। आज जहाँ पूरा विश्व धरोहर दिवस मना रहा है, वहां हम अपनी ही धरोहरों से अनजान क्षरित और सांस्कृतिक गरिमा में हमसे अतिशय कनिष्ठ देशों से अपने लिए प्रमाण पत्र बटोरते फिर रहे हैं।
हमारे प्रधानमंत्री हाल ही में फ़्रांस की राजधानी पेरिस में स्थित ‘यूनेस्को’ के मुख्यालय को सम्बोधित करके लौट रहे है। उनके प्रयासों से लगता है अब भविष्य की तस्वीर में सकारात्मक बदलाव आएगा। ‘यूनेस्को’ ही वह संस्था है जो दुनिया भर के उन स्थानों और भू-भागों को चिन्हित करती है जिनका चयन विश्व धरोहर के रूप में किया जाता है।विश्व विरासत स्थल समिति यूनेस्को के तत्वावधान में ऐसे स्थलों का चयन करती है जिन्हें बाद में मान्यता दी जाती है।यूनेस्को विश्व विरासत स्थल के रूप में ऐसे स्थलों का चुनाव करती है जो वन क्षेत्र,पर्वत ,झील ,मरुस्थल,स्मारक,भवन,शहर या ऐतिहासिक दृष्टिकोण से विश्व महत्व के हों।
वस्तुतःविश्व विरासत स्थलों को नामित करने और चिन्हित करने के पीछे भी एक दिलचस्प कहानी है। हुआ यूँ कि वर्ष 1959 में मिस्र सरकार ने आस्वान बांध बनवाने का निश्चय किया। इससे प्राचीन सभ्यता के ‘अबु सिंबल’ जैसे अनेक बहुमुल्य रत्नोँ के खजाने से भरी घाटी का बाढ मेँ बह जाना निश्चित था। तब युनेस्को ने मिस्र और सूडान सरकारों से अपील करने के अलावा, इसके रक्षोपाय एक विश्वव्यापी अभियान चलाया। नतीज़तन अबु सिंबल और फिले मंदिर को विभिन्न पाषाण टुकड़ों में अलग करके, एक ऊँचे स्थान पर ले जाकर पुनः स्थापित और प्रतिष्ठित किया गया। इस परियोजना की लागत लगभग 80 मिलियन अमेरिकन डॉलर थी, जिसमें 40 मिलियन 50 भिन्न देशों से एकत्रित किया गया था। इससे एक ओर जहां तात्कालिक तौर पर उस समस्या से उबरने में मदद मिली, वहीँ दूसरी ओर विश्व में स्थापित अन्य अनेक महत्त्वपूर्ण स्थलों के विषय में भी विश्व समुदाय चिंतित हुआ। यही नहीं इसके बाद इससे प्रेरित अनेक और अभियानों का श्री गणेश हुआ; जिनमें वेनिस और उसके लैगून का संरक्षण (इटली) , मोहन-जो-दड़ो (पाकिस्तान), बोरोबोदर मंदिर प्रांगण (इंडोनेशिया) आदि प्रमुख हैं। तब यूनेस्को ने अंतर्राष्ट्रीय स्मारक और स्थल परिषद के साथ पहल करके, एक सम्मेलन किया। इस सम्मलेन में सुनिश्चित किया गया कि जो स्थान और क्षेत्र मानवता के लिए मूल्यवान हैं, उनका विश्वव्यापी स्तर पर सार्वजनिक धरोहरों के रूप में संरक्षण किया जायेगा।

सबसे पहले संयुक्त राज्य संघ ने सांस्कृतिक संरक्षण को प्राकृतिक संरक्षण के साथ सँयुक्त करने का सुझाव दिया। वर्ष 1965 में ‘व्हाइट हाउस’ में आयोजित एक सम्मेलन में एतदर्थ “विश्व धरोहर ट्रस्ट” बनाने की माँग ने ज़ोर पकड़ा। जो विश्व के सर्वोत्तम प्राकृतिक और ऐतिहासिक स्थलों को वर्तमान पीढी और समस्त भावी नागरिकों हेतु संरक्षित करने का काम करे। तब निर्मित ‘अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ’ ने 1968 में ऐसे अनेक प्रस्ताव प्रस्तुत किये।1972 में संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा स्टॉकहोम, स्वीडन में आहूत ‘मानवीय पर्यावरण संरक्षण’ पर आयोजित समारोह में ऐसे अनेक प्रस्तावों को हरी झंडी मिली।इस समारोह में शामिल विभिन्न देशों के प्रतिनिधियों ने एक समान राय पर सहमति दी और ‘विश्व के प्राकृतिक और सांस्कृतिक धरोहरों पर सम्मेलन’ को यूनेस्को की सामान्य सभा ने 16 नवंबर 1972 को स्वीकृति प्रदान की।17 दिसंबर 1975 से इस संगठन ने विधिवत रूप से कार्य करना प्रारंभ किया।

जो भी देश इस सूची में अपने सथलों को नामांकित कराना चाहता है ,उसे सर्वप्रथम अपनी महत्वपूर्ण सांस्कृतिक और प्राकृतिक धरोहरों की एक सूची बनानी होती है। इसे ‘प्रस्तावित सूची’ कहते हैं। ‘विश्व धरोहर केन्द्र’ इस फाइल को बनाने में सलाह देता और सहायता करता है। कुछ कतिपय तथ्यों को छोड़कर यह किसी भी विस्तार तक हो सकती है। मान्यता बिंदु पर पहुंचने तक उस फाइल का आंकलन स्वतंत्र रुप से दो संगठन करते हैं। एक ‘अंतर्राष्ट्रीय स्मारक और स्थल परिषद’ और दूसरा ‘विश्व संरक्षण संघ’। यह संस्थाएं फिर ‘विश्व धरोहर समिति’ से सिफारिश करती है। समिति वर्ष में एक बार समीक्षा और मूल्यांकन सभा का आयोजन करती है। सभा यह निर्णय लेती है, कि प्रत्येक नामांकित सम्पदा को विश्व धरोहर सूची में सम्मिलित करना है या नहीं ? कईं बार यह समिति अपना निर्णय सुरक्षित भी रखती है। किसी भी स्थल को इस वैश्विक सूची में सम्मिलित होने के लिये प्रायः दस मानदण्ड उत्तीर्ण करने होते हैं तब जाकर वह स्थान या क्षेत्र विश्व धरोहर के रूप में नामित हो पाता है। जिनमें प्राकृतिक और सांस्कृतिक मानदंडों को सर्वोच्च वरीयता दी जाती है। वर्ष 2004 के अंत तक, सांस्कॄतिक धरोहर हेतु पृथक छः मानदण्ड थे और प्राकॄतिक धरोहर हेतु चार मानदण्ड थे। सन 2005 में, इसे बदल कर कुल मिलाकर दस मानदण्ड बना दिये गये। किसी भी नामांकित स्थल को न्यूनतम एक मानदण्ड पर खरा उतरना अनिवार्य है।
संस्था का उद्देश्य विश्व के ऐसे स्थलों को चयनित एवं संरक्षित करना होता है, जो विश्व संस्कृति की दृष्टि से मानवता के लिए महत्वपूर्ण हैं। कुछ खास परिस्थितियों में ऐसे स्थलों को इस समिति द्वारा आर्थिक सहायता भी दी जाती है। अब तक पूरी दुनिया में लगभग 1007 स्थलों को विश्व विरासत स्थल घोषित किया जा चुका है जिसमें 745 सांस्कृतिक,188 प्राकृतिक 29 मिले-जुले और 45 अन्य स्थल के रूप में नामित हैं। इटली सबसे अधिक धरोहर स्थल के रूप में प्रथम स्थान पर है।
यूनेस्को द्वारा विश्व विरासत घोषित किए गए भारत के भारतीय सांस्कृततिक और प्राकृतिक स्थैलों की सूची में 38 स्थान मान्य हैं। इन स्थानों में 9 स्थान पिछले पाँच वर्ष में ही शामिल किये गए हैं। मानित स्थलों में खजुराहों के मंदिर,कोणार्क का सूर्य मंदिर,आगरा का ताजमहल,अजंता एलोरा की गुफाएं,साँची के स्तूप,दिल्ली की क़ुतुब मीनार,बोधगया का महाबोधि मंदिर आदि शामिल हैं। सबसे नवीनतम सूचीबद्ध स्थल है गुजरात के पाटण में स्थित ‘रानी की वाव’। इसे वर्ष 2014 में शामिल किया गया है।जबकि राजस्थान के छह किले (आमेर,चित्तौड़गढ़,कुम्बलगढ़,रणथम्भौर,गागरौन तथा जैसलमेर) वर्ष 2013 में शामिल किये गए हैं।
‘मेरा भारत महान’ का नारा लगाने से भारत महान नहीं हो सकेगा। दुनिया को आपकी महानता दिखाई देनी चाहिए। इसे दुर्भाग्य ही कहा जायेगा कि हमारे देश में हमारे राजनीतिक प्रतिनिधि अत्यंत संकीर्ण सोच के साथ चलते रहे हैं। अपना मतलब सधता हो तो भानुमति का कुनबा जुड़ने लगता है और स्वार्थ सिद्धि न हो तो एक ही घर के दो सदस्य दो धुर विरोधी पार्टियों के बड़े नेता हो सकते हैं। ऐसे में अपने देश के अक्षुण्ण गौरव को पुनः प्रतिष्ठा दिलाने जैसे प्रयास ऐसे अवसरवादी नेताओं की कल्पना से परे की बात है। यूनेस्को का इस बाबत एक भी सम्मलेन आज तक भारत में नहीं हुआ है। जबकि थाईलैंड जैसा देश ऐसे आयोजनों की मेज़बानी कर चुका है। धरोहर की बात हो और भारत इतना पिछड़ा रहे इसके पीछे निश्चित तौर पर दूरदर्शिता का अभाव रहा है। भारत में प्रत्येक सौ किलोमीटर पर ऐसे स्थल विध्यमान हैं जो यूनेस्को की शर्तों पर खरे उतरते हैं। उत्तरप्रदेश, पूर्वोत्तर क्षेत्र के सातों प्रदेश, मध्य प्रदेश, उत्तराँचल, हिमाचल, महाराष्ट्र, कर्णाटक, आंध्रप्रदेश ,तेलंगाना, केरल, तमिलनाडु पंजाब, हरियाणा कौन सा ऐसा क्षेत्र है जो अपनी सांस्कृतिक -पुरातनतम प्राकृतिक और सभ्यतामूलक पृष्ठभूमि से अछूता है। सभी उठ खड़े होंगे तो विश्व पर्यटन के मानचित्र पर भारत का एक नया स्वरुप उदित होगा। हाँ सिर्फ गौरव अर्जित कर लेने से इति श्री नहीं होगी हमें विश्व बिरादरी में सर ऊँचा करके चलने की ख्वाहिश है तो उसके पैमानों पर भी खरा उतरना होगा। फिर इन बंजर क्यारियों और गड्ढों में सड़क से काम नहीं चलाया जा सकेगा ? ‘अतिथि देवो भवः’ एक स्लोगन नहीं है भारतीय संस्कार का वह उत्कर्ष है जो किसी भी अन्य देश के विचार में कभी भी नहीं रहा है।
प्रत्येक विरासत स्थल उस देश विशेष की संपत्ति होती है, जिस देश में वह स्थल स्थित हो; परंतु अंतर्राष्ट्रीय समुदाय का हित भी इसी में होता है कि वे आनेवाली पीढियों के लिए और मानवता के हित के लिए इनका संरक्षण करें. यही नहीं अपरोक्षतः इसके संरक्षण की जिम्मेवारी समूचे विश्व की होती है।ऐसे विशेष स्थलों को विशेष रूप से विश्व के पर्यटन मानचित्र पर स्थान मिलता है। भारी संख्या में विदेशी पर्यटक उस स्थान को देखने और उसकी विशेषता को जानने के लिए वहां आते हैं।उसी के मुताबिक विश्व व्यापार गति तय की जाती हैं। आवागमन के नए स्रोत और वायु मार्गों का सुनिश्चय किया जाता है। आप दुनिया से जुड़ते हैं और दुनिया आपसे। कितनी ही श्रेष्ठता क्यूँ न हो यदि वह कूप मंडूप होगी, तो कभी उसका सर गर्व से ऊँचा नहीं हो सकता। आज हम समय के भाल पर उन क्षणों के साक्षी हैं; जब उपनिषदों के ऋषियों का वचन ‘ वसुधैव कुटुंबकम’ यानि पूरी दुनिया ही हमारा परिवार है ,सत्य होने के कगार पर खड़ा है, ऐसे में ऐसे प्रयास जहाँ से देश का अक्षुण्ण गौरव पुनः अपने स्वर्णिम अतीत की झाँकी देख सके अत्यंत समीचीन उत्कंठा है। आखिरकार हम विश्व धरोहर नहीं हैं तो कौन है ?



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