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श्रेष्ठ राजनीति के संवाहक थे परशुराम

Posted On: 20 Apr, 2015 Others में

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जयंती -20 अप्रैल पर विशेष
भारतीय धर्म और अध्यात्म के क्षितिज पर अनेक दैदीप्यमान हस्ताक्षरों का उदय होता रहा है। हमारी श्रेष्ठ परम्परा के स्वर्णिम अध्यायों में अनेक चरित्र ऐसे हैं जो युग व्यतीत होने के उपरान्त आज भी प्रासंगिक है और सदैव रहेंगे भी। ‘रामायण’ और ‘महाभारत’ भारतीय धर्म के महासागर में खिले ऐसे दो पुष्प हैं जिनकी मूल्यवान देशनाऐं सदियों से समूचे विश्व की मानवीय चेतना को अनुप्राणित करती रही हैं। यदि यह कहें कि इन दो महाग्रंथों के अभाव में भारत की अस्मिता और गौरव पूर्ण नहीं हो सकता ;तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी ! इन दो महाकव्यों में कालखण्ड को भेदकर कुछ ऐसे चरित्रों का वर्णन मिलता है जो कालजयी प्रतीत होते हैं। हनुमान के बाद ऐसे ही दूसरे महान चरित्र हैं परशुराम। उन्हें श्रेष्ठ राजनीति के मूल्यों का प्रतिष्ठाता माना गया है। वे शासन में मानवीय गरिमा की सर्वोच्चता के पक्षधर थे। अपने कालखंडों में जहाँ भी उन्हें कुछ गलत होता हुआ प्रतीत हुआ उसे उन्होंने बाहुबल के दम पर दुरुस्त करके ही चैन की सांस ली। उनके आक्रामक स्वरुप और हिंसा के माध्यम से मूल्यों को सुव्यवस्थित करने के गुणों के कारण ही उन्हें हिन्दू धर्म में भगवान विष्णु के छठें अवतार होने का सम्मान अर्जित है।उन्हें ‘आवेशावतार’ की संज्ञा दी गयी है।

ऋषि जमदग्नि और विदुषी कन्या रेणुका के घर वैशाख शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को एक दीप प्रज्जवलित हुआ।जिसका नाम रखा गया परशुराम। ऋषि जमदग्नि के पांच पुत्रों (रुक्मवान, सुखेण, वसु, विश्वाभनस के बाद परशुराम सबसे कनिष्ठ थे।हिन्दू जीवन दर्शन में वैशाख की तीसरी तिथि को ‘अक्षय तीज’ भीकहा जाता है। भारतीय कालगणना के सिद्धांत के अनुसार इसी दिवस से ‘त्रेता युग’ का प्रादुर्भाव माना गया है। अतः इस तिथि को अतिशय शुभ और मंगलकारी कृत्यों हेतु(अबूझ तिथि )उपयुक्त माना गया है। जैसा कि नाम से ही स्पष्ट होता है इस दिन किये जाने वाले शुभ कार्यों का कदापि क्षरण नहीं होता। यही वज़ह है कि लोग अक्षय तीज को सोने- चाँदी का क्रय करते हैं और यज्ञ ,हवन दान पुण्य आदि कर्मों में विशेषतयाः प्रवृत्त होते हैं। सूत्र साक्षी है कि इसी दिन हयग्रीव और नर-नारायण के भी जन्म हुए अतः इस तिथि का महत्त्व और भी अधिक बढ़ जाता है।
आठ वर्ष की आयु आते-आते परशुराम ने अपने माता -पिता से सभी शिक्षाएं सीख ली थी। कालान्तर में वे अष्ट सिद्धियों के ज्ञाता हो गए। वे पशु-पक्षियों और अन्य प्राणियों के व्यवहार तथा बोलियों को समझने लगे थे। यही वज़ह है कि अनेक दन्त कथाओं में उनके वन्य प्राणियों से गहरी घनिष्ठता के वर्णन मिलते हैं। बचपन से ही वे कर्म को जीवन को सर्वोच्च आदर्श मानते थे। उनकी मान्यता थी की व्यक्ति जो भी करता है उसी से निर्मित होता है। वस्तुतः हमारा कृत्य ही हमारे समूचे व्यक्तित्व का निर्माण करता है। ब्राह्मण कुल में जन्म लेने के उपरांत भी उन्होने सदैव क्षत्रियों जैसा बर्ताव किया। छोटी सी उम्र से वे अपने साथ एक ताम्र फरसा रखते थे। इस शस्त्र के कारण भी उन्हें परशुराम के नाम से ख्याति मिली।
परशुराम ने दस महाविद्द्याओं में से एक देवी पीताम्बरा (माँ बगलामुखी) की घोर साधना की। उन्होंने भगवान शिव से विशेष सानिध्य प्राप्त कर अनेक दुर्लभ सिद्धियों को अर्जित किया। परशुराम के समय शस्त्र विद्द्या में कोई भी उनसे श्रेष्ठ नहीं था। उन्हें सभी शस्त्रों को उनके अभीष्ट मन्त्रों सहित प्रयोग करने का ज्ञान था। केरल की एक प्रचलित आत्मरक्षा की युद्धकला ‘कलरी पायट्टु’ और उसका उत्तरी स्वरुप ‘ वदक्कन कलरी ‘ भी परशुराम के आश्रम परंपरा में विकसित एक विशेष शैली है, जो आज भी जीवंत है।
‘ब्रह्मवैवर्त पुराण’ में एक कथानक देखने को मिलता है जिसमें परशुराम कैलाश पर्वत पर स्थित भगवान शिव के अन्तःपुर में प्रवेश की चेष्टा करते हैं।क्रोध को अपना आभूषण मानने वाले परशुराम वहां रास्ता रोके खड़े भगवान गणेश से भी भिड़ जाते हैं। उनके फरसे के प्रहार से गणेश जी का एक दांत टूट जाता है ;जिससे बाद में उन्हें एकदन्त के रूप में भी पुकारा जाने लगा।
एक अन्य प्रसंग के अनुसार महिष्मन्त कुल में चंद्रवंशी सम्राट सहस्त्रार्जुन अत्यंत बलशाली राजा थे।उन्हें सहस्त्रबाहु भी कहा जाता है। उन्होंने अपनी तपस्या के बल पर भगवान दत्तात्रेय से हज़ार हाथियों के बल का वरदान अर्जित किया था। परशुराम के पिता ऋषि जमदग्नि के पास ‘कामधेनु’ गाय थी। एक यज्ञ में शामिल होने आया सहस्रबाहु लोभवश इस गाय को बलपूर्वक अपने साथ ले गया। जब इस बात का ज्ञान परशुराम को हुआ तो उन्होंने सहस्रबाहु को युद्ध में मार गिराया और अपने पिता के अपमान का प्रतिशोध पूरा किया।बाद में सहस्रबाहु के पुत्रों ने घात लगाकर ऋषि जमदग्नि की हत्या कर दी। इस शोक से संतप्त परशुराम की माता रेणुका ने सती होकर अपना प्राणोत्सर्ग कर दिया। इस घटना ने परशुराम को झकझोर कर रख दिया उन्होंने प्रतिज्ञा ली कि वे संसार से हैहयवंशी क्षत्रियों ( क्षत्रियों का एक विशेष कुल) का नामोनिशान मिटा देंगे।उन्होंने 21 बार हैहयवंशी क्षत्रियों से युद्ध करके उन्हें पराजित किया।

बहुत कम लोगों को यह बात पता है कि आज जब भी कोई खिलाड़ी या राजनेता अपने लक्ष्य में विजयी होता है, तो वह विजयी मुद्रा में अपने दाहिने हाथ की तर्जनी और मध्यमा अँगुलियों से एक विक्टरी का विजयी चिन्ह प्रदर्शित करता है। वस्तुतः यह परशुराम की अति प्रसिद्द और मौलिक मुद्रा है। जिसे परशुराम ‘तात्विक विजय मुद्रा’ कहते थे। यह मुद्रा उनके प्राचीनतम प्रस्तर चित्रों में देखने को मिलती है। हर बार जीतने पर परशुराम इसका प्रदर्शन किया करते थे। भगवान परशुराम की इस विजय मुद्रा के कई भाव हैं। इसका एक भाव है कि -’जो शासक जीव और परमात्मा में अंतर समझते हैं उनका मैंने मर्दन किया है।’ दूसरा यह कि -’मनमुख और धर्मविमुख राजाओं को यह समझ लेना चाहिए कि या तो जनक की तरह निर्गुण निराकार ब्रह्म को जानने वाले तत्वज्ञानी राजा बनो या महाराजा दशरथ आदि की तरह सगुण साकार ब्रह्म को स्वीकार करो। अवैदिक अमर्यादित राजा मेरे कुठार से बच नहीं सकते।’

विवाह के समय स्वयम्बर में जब श्री राम से प्रत्यंचा चढ़ाते समय भगवान शिव का धनुष टूट जाता है तब आकाश-मार्ग द्वारा मिथिलापुरी पहुँच कर प्रथम तो स्वयं को “विश्व-विदित क्षत्रिय कुल द्रोही” बताते हुए “बहुत भाँति तिन्ह आँख दिखाये” और क्रोधान्ध हो “सुनहु राम जेहि शिवधनु तोरा, सहसबाहु सम सो रिपु मोरा” तक कह डाला। भले ही परशुराम को आवेशित अवतार कहा गया हो लेकिन क्रोध की अधिकता में भी वे अपना विवेक नहीं खोते। लक्ष्मण के व्यवहार पर उसे क्षमा करते हैं, तो तदुपरान्त अपनी शक्ति का संशय मिटते ही वैष्णव धनुष श्रीराम को सौंप उनसे क्षमा मांगते हुए तपस्या के निमित्त वन को लौट भी जाते हैं,यथा -

“अनुचित बहुत कहेउ अज्ञाता,
क्षमहु क्षमा मन्दिर दोउ भ्राता”

‘रामचरित मानस’ की ये पंक्तियाँ साक्षी हैं-
‘कह जय जय जय रघुकुल केतू,
भृगुपति गये वनहिं तप हेतू।’

वाल्मीकि रामायण में वर्णित कथा के अनुसार दशरथनन्दन श्रीराम ने जमदग्नि कुमार परशुराम का पूजन किया और परशुराम ने रामचन्द्र की परिक्रमा कर आश्रम की ओर प्रस्थान किया।

भगवान परशुराम का उल्लेख अनेक आदि ग्रंथों में मिलता है जिनमें ‘रामायण’, ‘महाभारत’, ‘भागवत पुराण’ और ‘कल्कि पुराण’ आदि प्रमुख हैं। परशुराम समूचे विश्व में वैदिक संस्कृति का प्रचार-प्रसार करना चाहते थे। कहा जाता है कि भारत के अधिकांश ग्राम उन्हीं के द्वारा बसाये गये। वे भार्गव गोत्र की सबसे आज्ञाकारी सन्तानों में से एक थे, जो सदैव अपने गुरुजनों और माता पिता की आज्ञा का पालन करते थे। उन्होंने सदा बड़ों का सम्मान किया। परशुराम का मंतव्य इस जीव सृष्टि को इसके प्राकृतिक सौंदर्य सहित जीवन्त बनाये रखना था। वे चाहते थे कि यह सारी सृष्टि पशु-पक्षियों, वृक्षों, फल-फूल औए समूची प्रकृति के अपने मौलिक स्वरुप के साथ अस्तित्वमान रहे।परशुराम का स्पष्ट सन्देश था कि-’राजा का धर्म वैदिक जीवन का प्रसार करना है न कि अपनी प्रजा से आज्ञा पालन करवाना और उसे दण्डित करना !’ उन्हें भार्गव के नाम से भी जाना जाता है।
परशुराम ने सैन्यशिक्षा केवल ब्राह्मणों को ही दी। लेकिन इसके कुछ अपवाद भी हैं। भीष्म, द्रोण (कौरव-पाण्डवों के गुरु व अश्वत्थामा के पिता) एवं कर्ण। मूलतः पांडव माता कुंती के पुत्र कर्ण को यह ज्ञात नहीं था कि वह जन्म से क्षत्रिय है। वह सदैव ही स्वयं को शूद्र समझता रहा लेकिन एक घटना जिसमे विश्रामरत परशुराम को कष्ट न होने देने के लिए एक विषैले जानवर द्वारा अपनी जांघ से बहते खून से भी कर्ण को विचलित न होते देख उसका सत्य छुपा न रह सका। जब परशुराम को इसका ज्ञान हुआ तो उन्होंने कर्ण को यह श्राप दिया कि उनका सिखाया हुआ सारा ज्ञान तब उसके किसी काम नहीं आएगा; जब उसे उसकी सर्वाधिक आवश्यकता होगी। इसलिए जब कुरुक्षेत्र के युद्ध में कर्ण और अर्जुन आमने-सामने होते है, तो वह अर्जुन द्वारा मार दिया जाता है क्योंकि शापित कर्ण को ब्रह्मास्त्र के प्रयोग की विधि विस्मृत हो चुकी होती है।
परशुराम मात्र एक योद्धा ही नहीं अपितु उच्च कोटि के विद्वान भी थे। उन्होंने एकादश छन्दयुक्त “शिव पंचत्वारिंशनाम स्तोत्र” भी लिखा। इच्छित फल-प्रदाता परशुराम गायत्री है-
“ओउम जमदग्न्याय विद्महे महावीराय धीमहि, तन्नो परशुराम: प्रचोदयात्।”
परशुराम स्त्रियों के हितों के प्रबल पक्षधर थे। उन्होंने अत्रि की पत्नी अनसूया, अगस्त्य की पत्नी लोपामुद्रा व अपने प्रिय शिष्य अकृतवण के सहयोग से विराट नारी-जागृति-अभियान का संचालन भी किया। शास्त्रों में वर्णित है कि अवशेष कार्यो हेतु जब ‘कल्कि अवतार’ होगा तब उनका गुरुपद ग्रहण कर उन्हें शस्त्रविद्या प्रदान करने पुनः परशुराम अवतरित होंगे।



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