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तांत्रिकों का सुप्रीम कोर्ट : कामाख्या

Posted On: 22 Jun, 2015 Others में

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(अम्बुबाची पर्व 22 से 26 जून पर विशेष)
भारत अगाध आस्था और विश्वासों का देश है। आस्थाएं ऐसी जो समयातीत हैं और विश्वास ऐसे जो जीवनातीत हैं। सृष्टि के उद्भव के चिंतक एक बात पर सहमत हैं कि सकल विश्व की संरचना की पृष्ठभूमि में पुरुष और प्रकृति का अद्भुत संयोग विध्यमान है। प्रकृति यानि आदिशक्ति युगों-युगों से जीवन का आधार बिंदु है। विश्व की अनेक सभ्य संस्कृतियाँ किसी न किसी स्वरुप में इसी मातृसत्ता के महत्त्व को स्वीकार करती हैं। माता कामाख्या का मंदिर इसी आदि शक्ति के सर्वोच्च प्रभा मंडल की गंगोत्री है। यहाँ से ध्यान,दर्शन, प्रार्थना,और तंत्र की नई नूतन धाराएं प्रवाहित होती हैं। इन धाराओं में सदियों से साधक मन ज्ञान और तपस्या की डुबकियां लगा रहा है। कामरूप कामाख्या देवी शक्तियों की सिरमौर हैं। पूर्वोत्तर भारत के इस छोर से करोड़ों श्रद्धालुओं तक स्नेह और अनुकंपाओं की अनवरत वर्षा हो रही है। यहाँ होने वाला चिर प्रतीक्षित वार्षिक उत्सव – ‘अम्बुबाची मेला’ इस वर्ष 22 जून से प्रारम्भ होकर 26 जून तक चलेगा। इसमें देश विदेश से लाखों व्यक्ति प्रतिवर्ष शामिल होते हैं।
धर्म और विज्ञान इस बात पर सहमत हैं कि समूची मानवीय श्रृखंला एक ही नर-मादा के संयोग से शुरू हुई। हिन्दू मतावलम्बी इस जोड़े को शिव-पार्वती के रूप में भी मान्यता देते हैं। ईसाई एडम और ईव तो इस्लाम हब्बा -खातून के रूप में। जरथुरस्त्री धर्म के मानने वाले पृथ्वी और आकाश को माता -पिता की संज्ञा देते हैं। जीव विज्ञान के अनुसार दो प्राणियों अमीबा और पैरामिशियम को छोड़कर प्रायः सभी जीवों की उत्पत्ति नर और मादा के युग्मों से ही हुई है। इस समूचे ब्रह्माण्ड में जो भी प्रकृति प्रदत्त है माता कामाख्या उसकी अधिष्ठात्री देवी हैं। वे योनि स्वरूपा हैं और मान्यता है की इस जगत की चराचर शक्तियों का प्रादुर्भाव उन्हीं के गर्भ से हुआ है। यहाँ तक कि वही ब्रह्मा ,विष्णु और महेश को भी धारण किये हुए हैं। यथा -
‘एका समस्त जगतां प्रकृति: सा यतस्ततः।
ब्रह्माविष्णुशिवैर्देवैर्धताम् सा जगतां प्रसूः।।’
( कालिका पुराण , अध्याय 32 मंत्र 66 )

कामाख्या मंदिर पूर्वोत्तर प्रान्त असम की राजधानी दिसपुर के पास गुवाहाटी से 8 किलोमीटर की दूरी पर कामरूप जनपद में नीलाचल पर्वत पर स्थित है। यह मंदिर एक पहाड़ी पर बना है व इसका महत् तांत्रिक महत्व है। प्राचीन काल से सतयुगीन तीर्थ कामाख्या वर्तमान में तंत्र सिद्धि का सर्वोच्च स्थल है। इसे तांत्रिकों की सुप्रीम कोर्ट कहा जाता है। जो साधना कहीं नहीं फलती, वह यहाँ साकार होती है। जो प्रार्थना कहीं नहीं सुनी जाती, वह यहाँ पूर्ण होती है। धार्मिक मान्यता है कि इस तीर्थ के दर्शन से सौ जन्मों के पाप कृत्यों से व्यक्ति अवमुक्त हो जाता है। मां भगवती कामाख्या का सिद्ध शक्तिपीठ सती के इक्यावन शक्तिपीठों में सर्वोच्च स्थान रखता है। यहीं भगवती की महामुद्रा (योनि-कुण्ड) स्थित है।
‘श्री कालिका पुराण’, ‘चूड़ामणि तंत्र’, ‘शिव सूत्र’ और ‘शक्ति संहिता’ के अनुसार देवी की 51 शक्ति पीठों का उल्लेख मिलता है; जबकि 26 उपपीठों का भी वर्णन है। एक कथा के अनुसार भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र से छिन्न -विछिन्न होकर सती पार्वती के 77 अंगावशेष जहाँ -जहाँ गिरे वहां -वहां शक्ति पीठों का अभ्युदय हुआ। इन्हीं अंगों में से महामुद्रा अर्थात योनि भाग जहाँ गिरा उसे कालांतर में कामरूप प्रदेश के रूप में जाना गया। वर्तमान में इस क्षेत्र को ही ‘कामाख्या’ के रूप में जाना जाता है। इस सिद्ध पीठ की अधिष्ठात्री देवी तथा भैरवी कामाख्या देवी नील पार्वती हैं। उनकी इच्छा के बिना कोई भक्त यहाँ कभी पहुँच ही नहीं सकता, ऐसी लोक मान्यता है।शिव और शक्ति सदैव एकसाथ रहते हैं। कामाख्या देवी के भैरव उमानंद शिव हैं। समस्त 51 शक्ति पीठों में कामाख्या शक्ति पीठ सर्वश्रेष्ठ और सर्वोच्च मान्यता प्राप्त है। कहा जाता है कि आप अगर किसी भी शक्ति पीठ पर न गए हों और आपने कामाख्या पीठ के दर्शन प्राप्त कर लिए तो यह सभी पीठों के दर्शन जैसा है। इसे तीर्थों का चूड़ामणि कहा गया है। ब्रह्मपुत्र नदी के तीर पर अवस्थित यह स्थान महा योगियों की शरण स्थली है। यथा-
‘तीर्थ चूड़ामणिस्तत्र यत्र योनिः पपातह।
तीरे ब्रह्मानदाख्यस्य् महायोगस्थलम् हि तत।’
(वृहद्धर्म पुराण – मध्यखंड – दशम अध्याय – मंत्र -37)

यही कारण है कि यह तीर्थ सभी तांत्रिकों ,मांत्रिकों,औघड़ों ,योगियों और सिद्ध पुरुषों के लिए सर्वाधिक महत्त्व रखता है। दुनिया भर के स्त्री -पुरुष साधक यहाँ वर्ष में एक बार पड़ने वाले ‘अम्बुबाची पर्व’ की प्रतीक्षा करते हैं। शक्ति उपासकों के लिए यह पर्व एक वरदान है।वस्तुतः यह पर्व देवी के रजस्वला होने का कालखंड है। शास्त्रों की मानें तो यह पर्व सतयुग में 16 वर्ष में एक बार ,द्वापर युग में 12 वर्ष में एक बार,त्रेता युग में सात वर्ष में एक बार तथा कलिकाल में प्रत्येक वर्ष में एक बार देवी रजस्वला धर्म को उपलब्ध होती हैं। अब जून माह में यह पर्व विशेष तिथियों में सम्पन्न होता है। इन्हीं तिथियों में देवी के गुप्त नवरात्र भी पड़ते हैं।चार दिन तक चलने वाले इस पर्व का अपना ही एक अलग महात्म्य है।
पौराणिक सत्य है कि अम्बूवाची पर्व के दौरान माँ भगवती रजस्वला होती हैं और मां भगवती की गर्भ गृह स्थित महामुद्रा (योनि-तीर्थ) से निरंतर तीन दिनों तक जल-प्रवाह के स्थान से रक्त प्रवाहित होता है। यह अपने आप में, इस कलिकाल में एक अद्भुत आश्चर्य का विलक्षण नजारा है। कामाख्या तंत्र के अनुसार -
‘योनि मात्र शरीराय कुंजवासिनि कामदा।
रजोस्वला महातेजा कामाक्षी ध्येताम सदा।।’
इस बारे में `राजराजेश्वरी कामाख्या रहस्य’ एवं `दस महाविद्या’ नामक ग्रथों में सविस्तार वर्णन है। विज्ञान आज भी इस आश्चर्य के सम्मुख मौन खड़ा है। यह क्या और कैसे है कोई भी नहीं जानता ! अम्बूवाची योग पर्व के दौरान मां भगवती के गर्भगृह के कपाट स्वत ही बंद हो जाते हैं। इस अवधि में उनका दर्शन भी निषेध हो जाता है। इन दिनों इस क्षेत्र विशेष में होने वाली फसलों के बीज भी नहीं बोये जाते। तीन दिनों के उपरांत मां भगवती की रजस्वला समाप्ति पर चौथे दिन उनकी विशेष पूजा एवं साधना की जाती है।
जिस प्रकार उत्तर भारत में कुंभ महापर्व का महत्व है, ठीक उसी प्रकार इस आद्यशक्ति के अम्बूवाची पर्व का महत्व है। इसके अंतर्गत विभिन्न प्रकार की दिव्य आलौकिक शक्तियों का अर्जन तंत्र-मंत्र में पारंगत साधक अपनी-अपनी मंत्र-शक्तियों को पुरश्चरण अनुष्ठान कर स्थिर रखते हैं। इस पर्व में मां भगवती के रजस्वला होने से पूर्व गर्भगृह स्थित महामुद्रा पर सफेद वस्त्र चढ़ाये जाते हैं, जो कि रक्तवर्ण हो जाते हैं। मंदिर के पुजारियों द्वारा ये वस्त्र प्रसाद के रूप में श्रद्धालु भक्तों में विशेष रूप से वितरित किये जाते हैं। मान्यता है कि इस वस्त्र को पाने वाले व्यक्ति की हर शुभ मनोकामना पूर्ण होती है। इस पर्व पर भारत ही नहीं बल्कि बंगलादेश, तिब्बत और अफ्रीका जैसे देशों के तंत्र साधक यहां आकर अपनी साधना के सर्वोच्च शिखर को प्राप्त करते हैं। वाममार्ग साधना का तो यह सर्वोच्च पीठ स्थल है। मछन्दरनाथ, गोरखनाथ, लोनाचमारी, ईस्माइलजोगी इत्यादि तंत्र साधक भी ‘शाबर तं’त्र में यहीं से अपना स्थान बनाकर अमर हो गये हैं।
आद्य-शक्ति महाभैरवी कामाख्या के दर्शन से पूर्व महाभैरव उमानंद, जो कि गुवाहाटी शहर के निकट ब्रह्मपुत्र नदी के मध्य भाग में टापू के ऊपर स्थित है, का दर्शन करना भी आवश्यक है। यह एक प्राकृतिक शैलदीप है, जो तंत्र का सर्वोच्च सिद्ध सती का शक्तिपीठ है। इस टापू को मध्यांचल पर्वत के नाम से भी जाना जाता है, क्योंकि यहीं पर समाधिस्थ सदाशिव को कामदेव ने कामबाण मारकर आहत किया था और समाधि से जाग्रत होने पर सदाशिव ने उसे भस्म कर दिया था। भगवती के महातीर्थ (योनिमुद्रा) नीलांचल पर्वत पर ही कामदेव को पुन जीवनदान मिला था। इसीलिए यह क्षेत्र कामरूप के नाम से भी जाना जाता है।
यहाँ तक जाने के लिए निजी नौकाएं और सरकारी बड़े स्टीमर भी उपलब्ध रहते हैं।
यह क्षेत्र पराविद्याओं की राजधानी रहा है। इसी लिए इसका एक प्राचीन नाम ‘प्रागज्योतिषपुर’ भी रहा है। उल्लेख है कि सृष्टि के प्रारम्भ में पितामह ब्रह्मा ने इसी स्थान पर बैठकर नक्षत्रों का सन्निवेश करके जगत की उत्पत्ति की थी। कामाख्या पीठ का क्या इतिहास है इसके कोई सटीक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं। लेकिन रामायण और महाभारत काल के अनेक खण्डों में इस तीर्थ का वर्णन मिलता है। पुरा प्राचीन काल से यह स्थान तपस्वियों और साधकों की योगस्थली रहा है। महामुनि वशिष्ठ, गोकर्ण, कपिल मुनि , आदि के आश्रमों का यहाँ उल्लेख मिलता है। प्राचीन काल में यह एक पृथक देश के रूप में अस्तित्वमान था। जिसके चार प्रमुख भाग थे – कामपीठ, रत्नपीठ, स्वर्णपीठ या भद्रापीठ और सौमार पीठ। महाभारत काल में इसी क्षेत्र के कौडिल्य नगर में विख्यात भीष्मक सम्राट की राजधानी थी। इसे कईं स्थानों पर विदर्भ राज्य के नाम से भी सम्बोधित किया गया है। भीष्मक की सुपुत्री रुक्मणी देवी का हरण कर श्री कृष्ण ने उनसे विवाह किया था।
प्रागज्योतिषपुर में ही नरकासुर और उसके पुत्र भगदत्त के राज्य का वर्णन मिलता है। भगदत्त की रूपवती कन्या भानुमति का विवाह कौरव सम्राट दुर्योधन से हुआ था। भगदत्त ने कुरुक्षेत्र के संग्राम में दुर्योधन की सहायता की थी अपनी असंख्य सेना के साथ वह अर्जुन द्वारा मारा गया था। कामाख्या देवी के मंदिर निर्माण के सम्बन्ध में भिन्न-भिन्न स्थानों पर विविध उल्लेख प्राप्त होते हैं। यह भी कहा जाता है कि कामदेव ने ऋषि विश्वकर्मा से इस मंदिर का निर्माण कराया था और इसका नाम आनंदाख्य मंदिर रखा था। भगवान बुद्ध के काल में इस क्षेत्र पर पालवंश के हिन्दू राजाओं के शासन के उल्लेख मिलते हैं। आदि शंकराचार्य ने इस पीठ के जीर्णोद्धार में महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन किया।
कामाख्या तीर्थ में सौभाग्य कुण्ड के निकट ही पश्चिम की ओर स्नान,तर्पण,श्राद्ध और मुण्डनं की व्यवस्था है। मंदिर में प्रवेश करते ही एकदम सामने बारह प्रस्तर स्तम्भों के मध्य चलंता देवी की मूर्ति शोभायमान है। इसी को हरगौरी प्रतिमा या भोगमूर्ति भी कहते हैं। अष्ट धातुमयी यह प्रतिमा प्रस्तम निर्मित पञ्चस्तर विशिष्ट सिंहासनासीन है। उत्तर में वृषवाहन,पञ्च वक एवं भुज विशिस्टा कामेश्वर महादेव उपस्थित हैं। दक्षिण भाग में षडानन ,द्वादश बाहु, विशिष्ठा अष्टादश लोचना सिंह वाहिनी कमलासना देवी विराजमान हैं। यह प्रतिमा महामाया कामेश्वरी नाम से भी जानी जाती हैं। भक्तजन पहले कामेश्वरी देवी एवं कामेश्वर शिव के दर्शन करते हैं तदोपरांत महामुद्रा दर्शन के लिए कुछ सीढियाँ नीचे उतरकर कुण्ड तक जाना पड़ता है। देवी की योनिमुद्रा -पाठ दस सोपान के नीचे अंधकारपूर्ण गुफा में आलोकित है। दीपकों के प्रकाश में माता का स्नेह दर्शनार्थियों को कृतार्थ करता है। कामाख्या देवी का नमस्कार मंत्र है -
‘ कामाख्ये वरदे देवी नीलपर्वत वासिनी।
त्वं देवी जगतां माता योनिमुद्रे नमोस्तुते।।’
मातृ अंग होने के कारण इसका आधा भाग सोने के टॉप से ढका रहता है। महामाया की दस महा विद्या अर्थात दस परम सत्ताओं की दात्री देवियों के अंतर्गत षोडशी कामाख्या यहाँ स्वयं विराजमान हैं जिनके शक्ति संचार की टंकार यहाँ कदम रखते ही अनुभूत होती है।

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