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सम्मान लौटा नहीं सकते !

Posted On: 21 Oct, 2015 Others में

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आपका सम्मान यदि वास्तव में हुआ है, तो उसे कभी भी लौटाया नहीं जा सकता। सम्मान सिर्फ खोया जा सकता है और उसके बाद आपमें और एक आम आदमी में किसी भी तल का कोई फर्क शेष नहीं रह जाता ! जो स्थिति अथवा अवस्था आप अर्जित कर सकते हैं, सिर्फ उसकी ही वापसी की जा सकती है , जो आपको प्रसाद स्वरुप प्राप्त हुआ है, उसकी वापसी सर्वथा संदिग्ध रहेगी। हाँ अगर कोई सोचता है कि सम्मान लौटाया जा सकता है; तो साथ ही उसे इस बात पर भी विचलित नहीं होना चाहिए कि सम्मान प्राप्त भी किया जा सकता है। दूसरे शब्दों में गर कहूँ; तो सम्मान यदि प्रपंच और नियोजन के तहत प्राप्त किया गया है तो ,सिर्फ उसी के लौटाने का नाटक किया जा सकता है।
सम्मान आपको दिया जाता है। आप अपनी पात्रता के गुणों की सुरभि में उसे कृतज्ञ भाव से अनुग्रहीत होकर स्वीकार करते हैं। वस्ततः सम्मान देना या ना देना सामने वाले पर निर्भर करता है। सच्चे सम्मान को न तो खरीदा जा सकता है और न ही लिया जा सकता है। आप अपने जीवन के उन अनुभवों को स्मरण करें जब आप अन्य लोगों द्वारा अत्यंत आदर की दृष्टि से देखे गए। जब आपके कार्यों की प्रशंसा में अन्य जनों द्वारा आपको सर -आँखों पर बैठाने के क्षण उपस्थित हुए थे ,क्या उन क्षणों को आपने नियोजित किया था यदि हां तो वह स्वांग भर था और यदि नहीं तो उन क्षणों को आपकी कोई भी तरकीब समय के गर्भ में वापस नहीं धकेल सकती। सत्य तो यही है जिसे उपार्जित नहीं कर सकते, उसे वापस कैसे कर सकेंगे। उस पर तो आपका वास्तविक अधिकार है ही नहीं। हाँ आप शिक्षा अर्जित करते हैं। डिग्रियां उपार्जित करते हैं। तभी तो अंक तालिका पर लिखा रहता है न उपार्जित अंक। प्रेम, स्नेह, आदर, सत्कार, स्वीकार भाव और अन्यों का आपके प्रति अहोभाव आप अपनी पात्रता से पाते हैं। यह सामने वाले पर निर्भर करता है यदि वह न चाहे तो आपको वंचित रहना होगा।

आप अपने शैक्षिक प्रमाण पत्र लौटा सकते हैं। अपना वोटर कार्ड ,अपना पासपोर्ट ,अपना वेतन और यहाँ तक की समस्त धन सम्पदा भी लौटा सकते हैं। यह सब देशना को उपलब्ध प्रज्ञा पुरुषों द्वारा सदियों पूर्व आपके अपने ही देश में लौटाया भी जा चुका है। अकूत सम्पदा को लात मारकर वनों को चले जाने वाले विज्ञ पुरुषों में राम, कृष्ण,बुद्ध,महावीर,युधिष्ठिर आदि के उल्लेखों से इतिहास पूरित है। मेरी मान्यता है कि अध्यात्म ही जागृत मनुष्य का अंतिम और एकमात्र गंतव्य रहा है और रहेगा भी !तभी तो बिल गेट्स आज भी अपनी अधिकांश संपत्ति को दान देकर ही सुख की अनुभूति कर रहे हैं। चार हज़ार करोड़ की संपत्ति के स्वामी फोर्टिस हेल्थ केयर के संस्थापक शिविंदर मोहन सिंह कारोबारी दुनिया को छोड़कर आगामी 1 जनवरी 2016 को मन की शांति के लिए राधास्वामी सत्संग व्यास की शरण में चले जायेंगे। यह सब तो ठीक है, होना ही चाहिए और भविष्य में और अधिक होगा भी लेकिन क्या गुणों को ,क्या अच्छाईयों को क्या आपके संस्कारों को आपके जीवन मूल्यों को कोई लौटा सकता है ? और वास्तव में यदि ये लौटा भी दिए गए तो उसके बाद आप बचते क्या हैं ?

एक सेठ किसी मूर्तिकार के पास यह देखने गया था कि मूर्ति कैसे बनाई जाती है। काफी दिनों तक वह सेठ मूर्तिकार के पास आता रहा। उसने देखा कि मूर्तिकार छैनी और हथौड़े से एक पत्थर पर प्रहार करता रहता है।बना तो कुछ भी नहीं रहा। जब उस धनी का धैर्य चूक गया तो उसने मूर्तिकार से सवाल किया – ‘आप मूर्ति नहीं बनाएंगे मैं मूर्ति का बनना देखने आया हूँ ? ‘ मूर्तिकार मुस्कराया और बोला -’मूर्ति बंनाने के लिए कुछ बनाने की ज़रूरत नहीं है, जो बना बनाया है; उसमें से ही कुछ अलग कर देने की आवश्यकता है। जो भी अतिरिक्त पत्थर लगा है, मैं उसे हटा रहा हूँ। जो भी अनावश्यक है जब वह हट जायेगा, तब जो भी आवश्यक है वह स्वतः ही प्रकट हो जायेगा। मूर्ति बनाई नहीं जाती,अनावृत्त होती है,उघाड़ी जाती है,डिस्कवर होती है।’ आपका सृजन और प्रतिभा का प्रदर्शन औरों के हृदयों को स्पंदित करता है। आपके अभूतपूर्व गुणों के लिए सामयिक समाज आपको कुछ अतिरिक्त देकरआपको सभी के सम्मुख अनावृत्त करता है। आप अपने स्वीकार्य स्वरुप में सभी के सामने उपलब्ध होते हैं। इस अवस्था को लौटाने का मतलब है फिर से निरे पत्थर हो जाना। फिर आपकी तराशगिरी एक तमाशागिरी से अधिक कुछ नहीं रह जाती।फिर आप सड़क के किनारे पड़े एक निर्जीव प्रस्तर खंड हैं और व्यक्ति के रूप में गोबर गणेश !

भारत में बहुत सी असमानताएं हैं। ये शब्दों के सन्दर्भ में भी हैं। हम बहुत सी स्थितियों और अवस्थाओं के लिए सार्थक शब्दों का प्रयोग नहीं कर पाते इससे विषमता और भी अधिक गहरा जाती है। ‘सम्मान’ शब्द के साथ भी कुछ ऐसा ही है। किसी के विचार,कृत्यों अथवा कृति पर यदि आप कृतार्थ हैं, तो रचियता का अभिनन्दन कर सकते हैं। सम्मान एक भाव है जो व्यक्त किया जा सकता है, दिया नहीं जा सकता। तभी तो भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों के लिए राष्ट्रपति जो पत्र प्रदान करते हैं उस पर स्पष्ट रूप से लिखा होता है -मैं भारत का राष्ट्रपति आपके व्यक्तिगत गुणों के लिए आपको अमुक सम्मान से अलंकृत करता हूँ। पदम श्री से लेकर भारत रत्न तक सभी सर्वोच्च अलंकरण हैं। यहाँ व्यक्ति की गरिमा उसके मूल्यों के कारण उसे सभी से पृथक करती है। जब समाज किसी को अनुकरण के योग्य समझता है, तब उसे अलंकरण के लिए चुना जाता है। एक सच्चे साहित्यकार के पास सम्मान के अलावा और होता ही क्या है और वह भी आप फेंक देने को आतुर हैं ?
जैसे राजनीति समाजसेवा का स्वाँग भरकर स्वार्थ की सीढियाँ तय करती है ,वैसे ही अब ‘स्व हित’ के लिए साहित्य के काम में कुछ लोग संलग्न हैं। आप जिस लेखक से प्रभावित हों उससे भूलकर भी मिलने मत चले जाना। आपको धक्का लगेगा। आपने जो कुछ पढ़ा वह उस व्यक्ति का वैचारिक सृजन था और जो आप देखेंगे वह उसके निजी संकल्पों और मूल्यों की निष्पत्ति होगी। विचार परिवर्तित हो सकते हैं मूल्य और संस्कार नहीं। तभी तो जब विचार बदलते हैं व्यक्ति सभी परिस्थितयों को भी बदलना चाहता है।वास्तव में इंसान जो कुछ किसी देखता है ,यह वह नहीं होता जो वह देख रहा होता है। यह वह होता है जो वह देखना चाहता है।

कभी कभी और भी अधिक सम्मान और पहचान की भूख प्रपंचों को रचने के लिए विवश करती है। फिर उसके लिए मार्ग चाहे जो भी हो ? अगर कोई व्यक्ति किसी बात से आहत है तो वह उसका प्रतिकार अपने उस हुनर से करेगा जिसकी वज़ह से वह उस क्षेत्र विशेष में विशिष्ट है, न कोई नाटक नौटंकी करके। ये बिलकुल ऐसा है जैसे एक नेता चुनाव हारने पर कसी लेखक की किताब को जलाने बैठ जाये। या कोई अभिनेता अपनी फिल्म के पिट जाने पर रास्ता जाम करने का निर्णय करे। जितना अधिक अहंकारी व्यक्ति होगा वह सम्मान के लिए उतना ही अधिक व्याकुल भी होगा। जब विचार बदल जाते हैं तो व्यवहार भी बदल जाता है। व्यक्ति अनुभवों,जीवन मूल्यों, स्वप्नों,अभीप्साओं और पुरूषार्थों का समुच्चय है। इन्हीं की छाया में यश और मान फलित होते हैं। हमारा व्यक्तित्व कुछ चीज़ों का एक जोड़ भर है।

एक बार राजा मिलिंद ने एक बौद्ध भिक्षु नागसेन को अपना राज्य अतिथि बनने का निमंत्रण भेजा।एक दूत को इसका दायित्व सौंपा गया। बाकायदा दूत निमंत्रण लेकर नागसेन के पास पहुंचा। नागसेन का उत्तर था -’मैं आऊंगा अवश्य लेकिन एक बात स्पष्ट कर दूँ कि भिक्षु नागसेन जैसा कोई है नहीं ! यह केवल एक काम चलाऊ नाम है। आप आये हैं तो मैं चलूँगा ज़रूर लेकिन ध्यान रहे ऐसा कोई आदमी कहीं है नहीं !’ समय और दिन निश्चित करके दूत लौट गया। दूत ने सारी बात सम्राट को बताई। सम्राट सारे वृतांत पर विस्मय चकित था। सम्राट ने पूछा – ‘वह आयेगा तो ? ‘ निश्चित समय पर भिक्षु नागसेन एक रथ पर बैठकर पहुंचा। सम्राट ने द्वार पर स्वागत किया और कहा – ‘भिक्षु नागसेन हम आपका स्वागत करते हैं।’ नागसेन हँसने लगा उसने कहा -’स्वागत स्वीकार करता हूँ लेकिन ध्यान रहे भिक्षु नागसेन जैसा कोई है नहीं !’ सम्राट ने कहा बड़ी पहेली की बातें करते हैं आप ? यदि आप नहीं हैं, तो कौन है जो आया है , कौन स्वीकार कर रहा है स्वागत, कौन दे रहा है उत्तर ?’
नागसेन मुड़ा और उसने सम्राट से कहा देखते हैं सम्राट मिलिंद ,यह रथ खड़ा है जिस पर मैं आया।’ सम्राट ने कहा- ‘हाँ रथ है।’ नागसेन ने आदेश दिया कि घोड़ों को निकालकर अलग कर लिया जाये। घोड़े अलग कर दिए गए। नागसेन ने मिलिंद की ओर देखा और पूछा ये घोडें रथ हैं ?’ सम्राट ने कहा घोड़े कैसे रथ हो सकते हैं? सामने की बमें जिनसे घोड़े बंधे थे खिंचवा ली गईं। नागसेन ने फिर पूछा ये रथ हैं ? सिर्फ दो डंडे रथ कैसे हो सकते हैं ? डंडे अलग कर दिए गए। फिर पहिये निकलवाकर पूछा कि क्या ये रथ हैं ? सम्राट ने कहा ये चाक हैं रथ नहीं ! एक एक अंग रथ का निकलता चला गया और हर बार सम्राट को कहना पड़ा कि नहीं ये भी रथ नहीं ,ये भी रथ नहीं ! फिर आखिर पीछे शून्य बचा वहां कुछ भी शेष न था। तब नागसेन से सम्राट से पूछा -’रथ कहाँ है अब ?’ और जितनी चीज़ें मैंने निकलवाईं, आपने कहाँ ये भी रथ नहीं ,ये भी रथ नहीं ,रथ कहाँ है अब ? ‘
सम्राट चौंककर खड़ा रह गया। रथ पीछे बचा भी नहीं था और जो चीज़ें निकलवा ली गईं थी, उनमें कोई रथ था भी नहीं ! तब भिक्षु नागसेन बोला समझे सम्राट ? रथ एक जोड़ था। रथ कुछ चीज़ों का संग्रह मात्र था। रथ का अपना अस्तित्व नहीं है कोई। कोई इगो नहीं है। रथ एक जोड़ है। यही बात हमारे समूचे व्यक्तित्व और कृतित्व पर भी लागू होती है। हम जो करते हैं वस्तुतः वैसे ही हो जाते हैं। अंततः हमारा कृत्य ही हमें निर्मित करता है। हमें बनाता है।
हमारी उपस्थिति हमें जीवन आयामों में अनेक प्रसाद प्राप्ति का पात्र सुनिश्चित करती है। मंदिर में जो प्रसाद हमें मिलता है, वह अर्जित करना नहीं होता आपकी उपस्थिति का पारितोष होता है। जो होगा सो पा लेगा। हाँ अगर आपको प्रसाद नहीं खाना है, तो उसे आप फेंक सकते हैं, पुरोहित को लौटा नहीं सकते ; और अगर आप लौटाने का उपक्रम करते हैं, तब आप ,मंदिर में प्रार्थना करने नहीं गए थे, कुछ लोगों का ध्यान आकर्षित करने के लिए गए थे।कोई छदम प्रदर्शन ही आपका वास्तविक हेतु था। फिर आप लौटाए या रखे आपकी पात्रता तो गयी।

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