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देह से देवत्व तक

Posted On: 13 Jun, 2016 में

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(कैलाश मानसरोवर यात्रा -11 जून से 9 सितम्बर तक)
देह से देवत्व तक

हमारा जीवन एक सफर ही तो है। एक यात्रा शुरू होती है माता के गर्भ में भ्रूण के रूप में जिसका वास्तविक गंतव्य होता है चिता की लपटें। इस बीच जन्म मरण के सोपान ज़िन्दगी के कैनवास पर अपने विविध रंगी चित्रों के इंद्रधनुष बनाते और मिटाते हैं। कुदरत की तरफ से इंसान को जो गुण मिला है ; वो है यायावरी। हम सभी अपनी-अपनी रूचि सामर्थ्य और पहुँच के आधार पर अलग -अलग तरह की यात्राएँ करते हैं; इन सभी यात्राओं में एक यात्रा सबसे भव्य और दिव्य है- ‘कैलाश मानसरोवर यात्रा’। यह यात्रा देह से देवत्व तक का सफर है। दुनिया भर की सभी यात्राओं में जो भी सब हो सकता है, वह अकेले इस यात्रा अनुभव में निहित है। धर्म,आस्था,विश्वास,सहयोग,रहस्य,रोमांच,प्रकृति,श्रद्धा, साहस,धैर्य,परिश्रम,अभय,अनुशासन,मैत्री,प्रेम और सौहार्द,क्या कुछ नहीं है इस अद्भुत यात्रा में। इस यात्रा के बाद प्रायः सभी यात्राएँ इसकी पूरक अनुभूतियाँ भर हैं। आप बस तुलना करते रहते हैं -’ये अच्छा तो है पर कैलाश जैसा नहीं ! यह जीवनजयी अनुभव है,हर किसी को एक बार अवश्य करने जैसा है।इस यात्रा के बाद अनुभूति के तल पर आपका व्यक्तित्व दो कालखण्डों में विभक्त हो जाता है -कैलाश पूर्व और कैलाश पश्चात ! श्रद्धा और आस्था के इस क्षतिज पर चार धर्म एक साथ नतमस्तक होते हुए दिखाई देते हैं।

न कोई मन्दिर, न मूर्ति और न ही कोई नियमित पूजा, फिर भी चीन-तिब्बत में प्राचीन काल से कैलास मानसरोवर हिन्दुओं का ऐसा सर्वोच्च धर्म स्थल है; जहां की यात्रा करना
प्रत्येक श्रद्धालु की सबसे बडी इच्छा होती है।मान्यता है कि यहाँ भगवान शिव साक्षात् विराजित हैं, इस स्थान के दर्शन भर से मोक्ष की प्राप्ति होती है।सबसे पहले तो आप यह समझ लीजिए कि कैलाश एक पर्वत होते हुए भी सिर्फ पर्वत नहीं है।हिन्दू धर्म, सिख धर्म, जैन धर्म और बौद्ध धर्म की गहरी मान्यताएँ इस स्थान विशेष से गहरी आबद्ध हैं। हिन्दुओं के लिए इससे बढ़कर कुछ भी नहीं। जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभ देव ने यहाँ अपने जीवन का बड़ा समय व्यतीत किया। यहीं उन्होंने ‘शिव कवच’ नामक ऋचाओं की रचना की ; यह कवच ‘रूद्राअष्टाध्यायी’ के साथ शिव पूजन का एक महत्त्वपूर्ण अंग है।आदि शंकराचार्य ने यहीं की यात्रा के बाद ही हिन्दू धर्म के लिए चार पीठों का अधिष्ठापन किया था। वर्णन है कि रानी मायादेवी को गौतम सिद्धार्थ में भगवत सत्ता के होने की प्राथमिक अनुभूति यहीं हुई थी। तिब्बत के स्थानीय बौद्ध ‘बोनपा’ भी इस स्थान को पवित्र मानकर यहाँ पूजा करते हैं। सिख धर्म के प्रवर्तक गुरु नानक देव जी के भी इस स्थान की यात्रा के उल्लेख मिलते हैं। कुल मिलाकर कैलाश मानसरोवर एक ऐसा स्थान है, जहाँ कईं धर्म एक दूसरे से गले मिलते हैं।
भौगोलिक विशेषज्ञ मानते हैं कि कैलाश समूची पृथ्वी का केंद्र है। मतलब यहाँ से पृथ्वी की दूरी सभी दिशाओं में एक समान है।’शिव संहिता’ में मान्यता है कि कैलाश इस पूरी पृथ्वी की धुरी है। इसी के कारण पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है और रात और दिन का प्रादुर्भाव होता है। कहते हैं कि प्रत्येक युग के समापन पर कैलाश अपने गुरुत्त्वाकर्षण से विराम लेते हैं और समूची धरा पर जलप्लावन के बाद पुनः सृष्टि के निर्माण का युग प्रारम्भ होता है।हम अपने सामान्य जीवन में अपने जीवन यापन के लिए बहुत सी चीज़ों का भण्डारण करते हैं ना, बस कुछ ऐसा ही समझ लीजिए कि यह परमात्मा के बीजों का भण्डारण गृह है। यहीं से पृथ्वी के लिए समस्त आवश्यक चीज़ों की आपूर्ति होती है;फिर वह चाहे प्रकृति से जुड़े तत्त्व हों अथवा जीवन जगत से। यहाँ सर्वोच्च परमात्मिक सत्ता अपनी संसद का क्रियान्वयन करती है। देवी देवताओं को उनके कार्य बाँटें जाते हैं और उनकी कार्यवाहियों का निरीक्षण इस जगत के पिता स्वयं करते हैं।

दुनिया में कैलाश से ऊंचे हिमशिखर और भी होंगे, कैलाश से ठंडी बर्फीली चोटियाँ और भी होंगी लेकिन कोई भी कैलाश जैसा नहीं है। इतनी दिव्यता कहीं भी नहीं इतना ईश्वरीय अनुभव कहीं भी नहीं ! कैलाश अपना विकल्प स्वयं है जो उसे पर्वत मानने की भूल करते हैं उनकी बुद्धि पर तरस खाने की ज़रूरत है।

उद्दालक ऋषि के पुत्र नचिकेता और मृत्यु के देवता यम का संवाद जिस स्थान पर हुआ, उस स्थान का नाम यमद्वार है। यही से कैलाश की परिक्रमा का प्रारम्भ होता है। इसी संवाद के फलस्वरूप समूची दुनिया को ‘कठोपनिषद ‘ प्राप्त हुआ। इसका वर्णन ‘तैतरीय ब्राह्मण’ और ‘महाभारत’ आदि ग्रंथों में आता है। यम और नचिकेता के संवाद को महर्षि वेदव्यास ने महाभारत के समय पुनः लिपिबद्ध किया।जर्मनी वेद विद्वान कठोपनिषद के जन्म का कालखण्ड लगभग 40 हज़ार वर्ष पुराना मानते हैं। भारतीय विद्वान भी वेदों और उपनिषदों की रचना को 40 से 80 हज़ार वर्ष पुराना मानते हैं। इस विषय पर मतभेद हैं लेकिन रामायण के समय तक आते आते वेद विद्याएँ और मंत्रों के प्रयोग अपने चरम पर थे। कठ उपनिषद के महत्त्व का परिचय इसी बात से हो जाता है कि शांति प्रार्थनाओं में सर्वाधिक प्रयुक्त मंत्र इसी उपनिषद का है। मंत्र इस प्रकार है – ‘ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु ।सह वीर्यं करवावहै।तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥’
पवित्र तीर्थ यात्रा के रूप में कैलाश परिक्रमा के उल्लेख हज़ारों वर्षों से मिलते हैं। भगवान ऋषभ देव के रूप में लगभग 10 हज़ार वर्ष से भी पहले यहाँ उनके आने का वर्णन मिलता है।इस कालावधि में अनेक ऋषि -मुनियों और तपस्वियों द्वारा कैलाश पर साधना करने और यहाँ निवासित रहने के उल्लेख मिलते हैं।पहले यह भारत का ही हिस्सा था लेकिन बाद में तिब्बत और अब चीन द्वारा रक्षित क्षेत्र है।

कैलाश मानसरोवर की यात्रा नेपाल,तिब्बत,चीन और भारत से प्रारम्भ होती है। बहुत से टूर ऑपरेटर इस यात्रा को कराते हैं लेकिन मेरा अनुभव यह है कि इसे सिर्फ और सिर्फ भारत सरकार के माध्यम से ही करना चाहिए। यहाँ सरकार और उससे जुड़े विभाग अत्यन्त महत्त्वपूर्ण ढंग से अपनी जिम्मेदारियों को अंजाम देते हैं। भारत का विदेश मंत्रालय बाकायदा इसकी अधिसूचना जारी करता है। समूची यात्रा का समस्त प्रबंधन अब ऑन लाइन ही किया जाता है। फरवरी माह के आसपास इसके पंजीकरण प्रारम्भ होते हैं। अप्रैल में इन्हें बंद कर दिया जाता है। जून के पहले पखवाड़े से यात्रा शुरू होकर सितम्बर के पहले पखवाड़े में सम्पन्न हो जाती है।इस वर्ष यह यात्रा 12 जून से शुरू होकर 9 सितम्बर को संपन्न होगी। यात्रा के लिए 18 जत्थे उत्तराँचल से होते हुए लिपुलेख दर्रा पार करके, जबकि 7 जत्थे सिक्किम के नाथुला दर्रे से कैलाश पहुंचेंगे। प्रत्येक जत्थे में 60 लोगों को चुना जाता है। इसके लिए कईं दौर की कठिन और सूक्ष्म मेडिकल जाँचें होती हैं। इस सबको पार करते-करते लगभग 40 से 50 लोगों का समूह ही एक जत्थे में औसतन रह पाता है।

लिपुलेख दर्रा वाला मार्ग यात्रा के लिए सर्वाधिक पवित्र और श्रेष्ठ माना जाता है। इसी रास्ते से सभी अवतारों और ऋषि मुनियों ने अपनी यात्राएँ की थीं। लिपुलेख मार्ग से सरकारी व्यव लगभग एक लाख साठ हज़ार रूपये है जबकि नाथुला मार्ग से दो लाख रूपये प्रति व्यक्ति आता है। लिपुलेख से 25 दिन और नाथुला से 23 दिन की यात्रा है। प्रायः आप यह मानकर चलें कि मोटा मोटी तौर पर एक आदमी को इस यात्रा के लिए ढाई लाख रूपये खर्चने होते हैं। लिपुलेख मार्ग पर जटिल ,कठिन और दुर्गम पैदल चढ़ाई -यात्रा करनी पड़ती है जबकि नाथुला से पैदल यात्रा सिर्फ परिक्रमा भर की है शेष मोटर मार्ग से पूरी की जाती है। नरेंद्र मोदी के प्रयासों से नाथुला दर्रा पिछले वर्ष से ही इस यात्रा के लिए प्रयुक्त होना शुरू हुआ है। इस मार्ग को वयोवृद्ध और अशक्त अधिक उम्र के व्यक्तियों के लिए उचित माना जाता है। शारीरिक रूप से पूर्ण स्वस्थ और बीमारियों से मुक्त व्यक्तियों को इस यात्रा के लिए सर्वाधिक उपयुक्त माना जाता है। अत्यन्त खतरनाक और जानलेवा इस यात्रा में बारिश, बर्फ,पत्थर और पानी के प्रवाह को झेलते हुए लगभग 150 किलोमीटर की कुल पैदल यात्रा -चढ़ाई करनी पड़ती है। चीन क्षेत्र में जिन दिनों आप यात्रा गत रहते हैं उन दिनों वास्तव में आप प्रभु के ही हवाले होते हैं। चूंकि यह यात्रा अत्यधिक ठण्डे एवं बीहड़ इलाके सहित कई दुर्गम परिस्थितियों तथा 19,500 फीट तक की ऊंचाई के रास्ते से होकर गुजरती है जहां सीमित सुविधाएं हैं, इसलिए यह यात्रा शारीरिक एवं चिकित्सीय रूप से अस्वस्थ लोगों के लिए खतरनाक हो सकती है। प्राकृतिक आपदा या अन्य किसी कारण से यात्री की जीवन हानि के लिए, चोट लगने पर या व्यक्तिगत या संपत्ति की क्षति के लिए किसी भी रूप में भारत सरकार जिम्मेदार नहीं होती है। तीर्थयात्री अपनी लागत, जोखिम एवं परिणाम के लिए स्वयं उत्तरदायी रहते हैं। यदि सीमा पार (चीन/तिब्बत) में किसी यात्री की मृत्यु हो जाती है, तो भारत सरकार तीर्थयात्री का पार्थिव शरीर वापस लाने हेतु बाध्य नहीं है। इसलिए, मृत्यु के संदर्भ में चीनी क्षेत्र पर पार्थिव शरीर का अंतिम संस्कार करने के लिए सभी यात्रियों को सहमति पत्र पर हस्ताक्षर करना अनिवार्य होता है।
असल में यात्रा में कईं पड़ाव ऐसे हैं जहाँ आपका मृत्यु से साक्षात्कार होता है। एक अत्यन्त छोटी पगडण्डी पर आप,उधर से आ रहे यात्री और सामान और व्यक्तियों को ढो रहे खच्चर -घोड़े चलते हैं। ऐसे में दुर्घटनाओं की ज़्यादा संभावनाएं रहती हैं। चढ़ाई भी ऐसी कि कईं स्थानों पर आपको पत्थरों के ढेर पर ही चढ़कर चलना होता है। प्रायः यात्रा तड़के जल्दी लगभग चार -पांच बजे प्रतिदिन शुरू हो जाती है। पहाड़ों पर दोपहर बाद अधिकतर मौसम बिगड़ जाता है अतः यही समय यात्रा के सर्वाधिक उपयुक्त होता है। आपको विशेष तरह के जूते,और सामान लेकर चलना होता है। तापमान में बेहद परिवर्तन रहते हैं कुछ क्षेत्रों में तापमान शून्य से 20 डिग्री तक कम रहता है। सुन्दर और दिव्य मानसरोवर झील में स्नान का महत्त्व अनन्य है उस अनुभव का वर्णन किया ही नहीं जा सकता !
अनेक क्षेत्रों में वायु विरल रहती है और प्रायः सभी को सांस लेने में कठिनाई होती है। वहां प्रभु का नाम जपने और कपूर बार-बार सूंघने से काम चल जाता है। रात के अंतिम प्रहर में ज़्यादातर साँस की समस्या रहती है। जिन्हें फेफड़ों से सम्बंधित या स्वाँस से जुड़े रोग हैं उन्हें चिकित्सक नहीं जाने का परामर्श देते हैं। रास्ते में गढ़वाल मंडल विकास निगम,इंडो तिब्बत सीमा पर तैनात भारतीय जवान, उनके अधिकारी ,भारतीय सेना के जवान आपका इतना ध्यान रखते हैं कि आप जीवन भर के लिए उनके ऋणी होकर लौटते हैं। उनकी सभी व्यवस्थाएं लाजवाब हैं।
इस यात्रा के बाद आपके जीवन से सभी प्रकार के भय समाप्त हो जाते हैं। इसका कारण है कि प्रकृति की सौम्यता और उसका प्रचण्ड स्वरुप दोनों से ही आप बखूबी रूबरू जो हो चुके होते हैं। यह यात्रा निश्चित रूप से अद्वितीय है,अनन्य है, अत्यन्त आनंद का विस्तार करने वाली है। इस यात्रा में आप परमात्मा को उसके दिए गुणों के लिए साधुवाद सम्प्रेषित करते हैं। देह से देवत्व तक आपका वर्तुल जो पूर्ण हो रहा होता है।
(लेखक गत वर्ष यह यात्रा कर चुके हैं )



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