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मानवीय गुणों का सत्यापन है गुरु दीक्षा

Posted On 18 Jul, 2016 में

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बिना गुरु गत नहीं । यहाँ गत का अभिप्रायः ‘गति’ से है। जो जीवन गतिमान है, वही सार्थक और सिद्ध है। विश्व के सभी धर्मों में अलग-अलग ढंग से गुरु परंपरा के निर्वहन के तौर-तरीके हैं लेकिन भारत की गुरु परंपरा अद्वितीय और अनूठी है। यहाँ सीखने से सिखाने तक का एक वर्तुल पूरा होता है।भारतीय परंपरा में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण जो बात है वह यह कि यहाँ शिक्षा तब तक अधूरी है; जब तक कि वह दीक्षा के साथ संपन्न न हो ! दीक्षा अपने गहरे और सतत अर्थों में मानवीय मूल्यों का सत्यापन है। एक ऐसी अवस्था जब सद्गुरु इस तथ्य के प्रति आश्वस्त हो जाता है कि मैंने अपने शिष्य को जो भी कुछ सिखाया है, वह उसका सम्यक और सार्थक अर्थों में उपयोग करेगा।
वैश्विक परिदृश्य में बहुत कुछ परिवर्तित हो रहा है । मानवीय सरोकार भी बदल रहे हैं । एक अदृश्य प्रतिस्पर्धा ने संवेदनाओं के ललाट पर चिंता की गहरी रेखाएं उत्कीर्णित कर दी हैं। सभी दौड़ रहे हैं लेकिन जब उनसे पूछो कि दौड़ रहे हो, ये तो ठीक है लेकिन जाना कहाँ हैं , तब उनका जवाब चौंकाने वाला होता है – ‘ये तो हमें नहीं मालूम।’ ये गलत शिक्षा का परिणाम है। वर्षों पहले दुनिया भर के विचारक सोचते थे कि शिक्षा के प्रसार से यह दुनिया और भी अधिक सभ्य , सुसंस्कृत और श्रेष्ठ हो जायेगी लेकिन आज अगर उन्हीं से पूछो; तो वे कहते हैं कि मनुष्य के पतन का कारण गलत शिक्षा है। व्यक्ति शिक्षित तो हो गया लेकिन श्रेष्ठ मूल्यों में निष्णात नहीं हो पाया , उसकी दीक्षा नहीं हो पाई। दो और दो चार होते हैं ,यह शिक्षा से आता है लेकिन इन चार का सही प्रयोग क्या है, यह दीक्षा का विषय है !

भगवान बुद्ध अपने शिष्यों को तब तक सक्रिय जीवन में उतरने की अनुमति नहीं देते थे जब तक कि वह उनके दृष्टिकोण से योग्य पात्र सिद्ध नहीं हो जाते थे। एक बार उनके तीन शिष्यों ने अपनी शिक्षा पूर्ण हो चुकने के पश्चात् उनसे अपने सामाजिक जीवन में लौटने की अनुमति मांगी। बुद्ध ने कहा कि तुम जाना चाहते हो, तो ये तो ठीक है लेकिन इससे पूर्व तुम्हें एक अज्ञात दीक्षा परीक्षा से गुजरना होगा । शिष्यों ने सहमति में अपनी गर्दन हिलायी। जिस मार्ग से उन शिष्यों को गुजरना था; वे वहां एक झाड़ी के पीछे छिपकर ख़ड़े हो गए। छोटी और संकरी पगडण्डी पर उन्होंने कुछ कांटे बिखरा दिए । पहला शिष्य जब वहां से गुजरा, तो उसने कांटे पड़े देखकर पास के बगीचे के माली को गालियां बकीं । तभी उसे याद आया कि उसे तो बहुत दूर अपने शहर पहुंचना है, वह जल्दी से पगडण्डी के किनारे होता हुआ आगे निकल गया। फिर उसके बाद दूसरा शिष्य आया उसने भी कांटें पड़े देखकर नाक भौं सिकोड़ी और उनके बीच से किसी तरह रास्ता बनाते हुए आगे बढ़ गया , तब फिर तीसरा शिष्य आया तब तक थोड़ी थोड़ी साँझ करीब होने लगी थी , जब उसने मार्ग पर कांटें पड़े देखे तो वह चिंतित हुआ। उसे विचार आया कि जल्दी ही शाम हो जायेगी और अगर अँधेरे में कोई जानवर या व्यक्ति इस मार्ग से गुजरा तो वह काँटों के चुभने से नाहक ही कष्ट पायेगा। मेरा क्या है जब इतनी देर हो ही गयी है तो थोड़ी देर और सही लेकिन मेरे गुरु की आज्ञा है कि जानबूझकर किसी को दुःख की अवस्था में छोड़ना पाप है। वह पगडण्डी पर बैठकर कांटें बीनने लगा। जैसे ही उसने सभी कांटें मार्ग से हटा दिए वैसे ही झाड़ी के पीछे छिपकर दूर से सारा नज़ारा देख रहे बुद्ध सामने प्रकट हो गए ।
उन्होंने पहले दोनों शिष्यों को पुनः एक साल तक आश्रम में रहकर पढ़ने का आदेश दिया और उस तीसरे को जिसने मार्ग से कांटे साफ़ किये थे सक्रिय सामाजिक जीवन में लौटने की अनुमति दी। उन्होंने कहा जब तक व्यक्ति दूसरों के जीवन के दुःख दर्द को अनुभूत करने की संवेदना नहीं रखता वह सच्चे अर्थों में शिक्षित कहलाने का अधिकारी नहीं है। जब तक कोई वास्तविक शिक्षित नहीं है तब तक वह दीक्षित नहीं किया जा सकता।
आज पगडंडियां तो नहीं हैं पर कितने शिक्षित हैं जो दूसरों के जीवन में कांटें बीनने का माद्दा रखते हैं। कृत्रिम और दिखावटी शिक्षा का यह परिणाम निकला है कि औरों के तो छोड़िए आदमी अपने भी पाँव के कांटे को देखने और निकलने की सामर्थ्य खोता जा रहा है। हमारे विश्व विद्द्यालय दीक्षांत समारोह आयोजित तो करते हैं लेकिन वहां से निकलने वाले कितने युवा आज सही मायनों में दीक्षित है यह विचारणीय है ?

आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष में ही गुप्त नवरात्र आते हैं। पंचमी तिथि को ‘हेरापंचमी’ कहा जाता है। इस दिन गुरु अपने सुपात्र शिष्यों के सभी कष्टों को विसर्जित करने के लिए प्रभु से प्रार्थना करता है। अष्टमी और नवमी को दीक्षित होने वाले शिष्यों की सूची का पुनः रीक्षण किया जाता है। हेरा पंचमी के धन्यवाद और आभार को व्यक्त करने के लिए शिष्यगण इसके दसवें दिन गुरु पूर्णिमा पर अपनी कृतज्ञता ज्ञापित करते हैं। इस दिन गुरु के उपकारों से उपकृत होने का पर्व मनाया जाता है। शिष्य कोई भी हो सकता है लेकिन दीक्षा उसे ही दी जाती है जिसे गुरु योग्य समझते हैं।गुरु दीक्षा के बाद शिष्य इस बात का संकल्प करते हैं कि वे गुरु बताये मार्ग का ही
अनुसरण करेंगे। सिर्फ इसी दिन दिए गए उपहारों को गुरु अस्वीकृत नहीं करते हैं। प्रायः गुरु इस दिन शिष्यों के नए नामकरण भी करते हैं ; जो इस बात का प्रतीक है कि आज से उनका एक नया जीवन जीवन प्रारम्भ होता है। परंपरा है कि एक बार गुरु धारण करने के बाद जीवन भर कोई दूसरा गुरु नहीं बनाया जाता है। बार बार गुरु बदलने वालों को कुमार्गी कहा जाता है।

विभिन्न गुरु परम्पराओं में अलग अलग ढंग से दीक्षा पर्व की व्यवस्थाएं की जाती हैं। गुरु जीवन पर्यंत अपने शिष्यों को देता ही है। वह वो देता है जो कोई नहीं दे सकता -’ज्ञान’ ! बिना ज्ञान के मानव और पशु में कोई नही भेद नहीं है। तभी तो कबीर दास ने गुरु को प्रभु से भी पहले रखा है। हम उपकृत हैं कि भारतीय गुरु परंपरा के क्षितिज पर एक से एक नायाब हीरे नक्षत्र बनकर दैदीप्यमान हैं। बुद्ध, महावीर, नानक, कबीर, कृष्ण, गोरख, रामकृष्ण परमहंस, आदि शंकर, पतंजलि, विदुर , वेदव्यास, वशिष्ठ, दयानंद आदि यह सूची बहुत लंबी है इतनी लंबी कि विदेशी विचारकों को इस सूची से सार्थक ईर्ष्या होती है।
जो गुर सिखाए वो गुरु । जो गड्ढे में धकेले वो गुरुघंटाल। सही मायने में गुरु कुछ देता नहीं अपितु आपसे लेता है । वह लेता है आपकी वासनाएं , आपकी दमित कामनाएं , आपके लोभ, आपके क्रोध , आपके मोह और आपके सभी वो विकार जिनसे आपका जीवन दुखमय है। इसीलिए गुरु परंपरा में दीक्षित पात्रों से एक मनपसंद चीज़ के त्याग की परिपाटी भी है। इस लेने की प्रक्रिया में सूक्ष्म रूप से देना छिपा है। धीरे धीरे जब आपका जीवन साफ़ और शुद्धतम होता जाता है तब एक दिन आप भी गुरु के ही समान दिव्य और भव्य स्वरुप को उपलब्ध हो जाते है। यह वह अवस्था है जब एक प्रदीप्त दीपक से दूसरा दिया जीवंत हो उठता है। एक दिये से आप हज़ारों दिये जला सकते हैं जबकि एक हज़ार वाट की हेलोजन से एक जीरो वाट का बल्ब भी नहीं । दिये में एक चेतनता है एक जीवंतता है जो बताती है कि प्राणवान वस्तु ही गतिमान हो सकती है। यह वही गति है जिसका वलय सच्चे गुरु के सानिध्य में स्फुटित होता है।
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